लैक्टोज़ इनटॉलरेंस के लक्षण और घरेलू उपाय: दूध से एलर्जी में फर्क, थाली में बदलाव और जांच की पूरी बात
छोटा जवाब
अगर दूध पीने के कुछ ही देर बाद पेट में गैस, मरोड़ या हल्का दस्त जैसा महसूस होता है, और चाय में थोड़ा सा दूध ठीक रहता है पर एक पूरा गिलास दूध पीते ही पेट बिगड़ जाता है, तो लैक्टोज़ इनटॉलरेंस उन वजहों में से है जिन्हें समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है.
इसका मतलब यह नहीं कि डेयरी पूरी तरह बंद करनी पड़ेगी. ज़्यादातर मामलों में थाली में छोटे बदलाव, जैसे एक बार में दूध की मात्रा कम करना, दही और पनीर जैसी फर्मेंटेड डेयरी को प्राथमिकता देना, और खाली पेट के बजाय खाने के साथ डेयरी लेना, काफी फर्क डाल देते हैं. अगर लक्षण साफ और बार बार दिखते हैं, तो एक साधारण जांच या कुछ हफ्तों की एलिमिनेशन डाइट यह साफ कर देती है कि असली वजह लैक्टोज़ है या कुछ और.
लैक्टोज़ इनटॉलरेंस है क्या और शरीर में ऐसा क्यों होता है
दूध और डेयरी में एक खास तरह की शक्कर होती है जिसे लैक्टोज़ कहते हैं. इसे तोड़ने के लिए शरीर को एक एंजाइम चाहिए होता है, जिसे लैक्टेज़ कहा जाता है, और यह एंजाइम छोटी आंत में बनता है.
बचपन में ज़्यादातर लोगों में यह एंजाइम भरपूर मात्रा में बनता है, क्योंकि उस उम्र में मां का दूध ही मुख्य खाना होता है. उम्र बढ़ने के साथ साथ बहुत से लोगों में शरीर यह एंजाइम बनाना धीरे धीरे कम कर देता है. जब लैक्टेज़ कम बनता है, तो लैक्टोज़ छोटी आंत में बिना टूटे आगे बड़ी आंत तक पहुंच जाता है. वहां मौजूद बैक्टीरिया इसे किण्वित यानी फर्मेंट करते हैं, और इसी प्रक्रिया से गैस, पानी खिंचाव और पेट में मरोड़ जैसी शिकायतें शुरू होती हैं.
यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि एक बहुत आम शारीरिक बदलाव है, और भारत सहित एशिया के बड़े हिस्से में यह पश्चिमी देशों के मुकाबले कहीं ज़्यादा आम पाया गया है.
लक्षण कौन से हैं और दूध पीने के कितनी देर बाद दिखते हैं
लैक्टोज़ इनटॉलरेंस के लक्षण आमतौर पर डेयरी खाने या पीने के तीस मिनट से दो घंटे के बीच दिखना शुरू होते हैं, और यह समय और तीव्रता दोनों इस बात पर निर्भर करते हैं कि शरीर में लैक्टेज़ कितना कम बना है और कितनी मात्रा में डेयरी ली गई है.
पेट में गैस और फुलावट. खाने के बाद पेट भारी और फूला हुआ महसूस होना, यह सबसे पहली और सबसे आम शिकायत है.
पेट में मरोड़ या ऐंठन. नाभि के आसपास या पूरे पेट में हल्का से लेकर तेज़ दर्द, जो अक्सर गैस निकलने या शौच के बाद कम होता है.
दस्त या ढीला मल. खास तौर पर ज़्यादा मात्रा में दूध पीने के बाद, कई बार पानी जैसा दस्त भी हो सकता है.
बार बार डकार और गैस निकलना. यह अकेला लक्षण ज़्यादा परेशान नहीं करता, पर बाकी शिकायतों के साथ मिलकर पूरी तस्वीर साफ करता है.
कुछ लोगों में जी मिचलाना. खास तौर पर जब डेयरी की मात्रा सामान्य से ज़्यादा ली गई हो.
ध्यान रहे कि हर व्यक्ति की सहनशक्ति अलग होती है. कुछ लोग एक कप चाय में मौजूद थोड़े से दूध को आराम से पचा लेते हैं, पर एक पूरा गिलास दूध उन्हें परेशान कर देता है. यह मात्रा पर निर्भर करने वाली समस्या है, पूरी तरह सब कुछ या कुछ नहीं वाली बात नहीं.
लैक्टोज़ इनटॉलरेंस और दूध से एलर्जी में फर्क कैसे समझें
यह वह जगह है जहां सबसे ज़्यादा उलझन होती है, और दोनों को एक मान लेना गलत कदमों की तरफ ले जा सकता है.
लैक्टोज़ इनटॉलरेंस पाचन से जुड़ी समस्या है. इसमें शरीर लैक्टोज़ नाम की शक्कर को ठीक से तोड़ नहीं पाता, और इसके लक्षण मुख्य रूप से पेट तक सीमित रहते हैं, जैसे गैस, मरोड़ और दस्त. यह जानलेवा नहीं होती और मात्रा कम करके या थोड़ा इंतज़ार करके आमतौर पर अपने आप ठीक हो जाती है.
दूध से एलर्जी पूरी तरह अलग चीज़ है. यह शरीर की रोग प्रतिरोधक व्यवस्था से जुड़ी प्रतिक्रिया है, जिसमें शरीर दूध में मौजूद प्रोटीन को खतरा समझ लेता है. इसके लक्षण सिर्फ पेट तक सीमित नहीं रहते, इसमें त्वचा पर चकत्ते, होंठ या चेहरे पर सूजन, सांस लेने में दिक्कत और कुछ गंभीर मामलों में पूरे शरीर की तेज़ प्रतिक्रिया भी शामिल हो सकती है. यह स्थिति गंभीर हो सकती है और तुरंत मेडिकल ध्यान मांगती है.
फर्क समझने का एक आसान तरीका यह है कि लैक्टोज़ इनटॉलरेंस में दूध की थोड़ी मात्रा आमतौर पर बर्दाश्त हो जाती है, जबकि असली दूध एलर्जी में थोड़ी सी मात्रा भी प्रतिक्रिया शुरू कर सकती है. अगर पेट की शिकायतों के साथ त्वचा, सांस या सूजन से जुड़े लक्षण भी दिखें, तो इसे घर पर समझने की कोशिश करने के बजाय डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है.
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किन लोगों में यह समस्या ज़्यादा आम है
वयस्क होने के बाद ज़्यादातर भारतीय आबादी में लैक्टेज़ का बनना स्वाभाविक रूप से कम होता है, इसलिए यह समस्या यहां अपेक्षाकृत आम मानी जाती है. जिन लोगों के परिवार में पहले से किसी को यह शिकायत रही हो, उनमें भी खतरा ज़्यादा रहता है. जिन्हें पेट या आंत से जुड़ी कोई और स्थिति रही हो, जैसे किसी संक्रमण के बाद आंत की परत कमज़ोर पड़ जाना, उनमें भी अस्थायी रूप से लैक्टोज़ सहनशक्ति घट सकती है. उम्र बढ़ने के साथ भी यह समस्या धीरे धीरे बढ़ती देखी जाती है.
इसका मतलब यह नहीं कि बचपन में डेयरी ठीक से पचाने वाला हर व्यक्ति उम्र के साथ ज़रूर इस समस्या का शिकार होगा, पर अगर ऊपर बताए समूह में आप आते हैं और लक्षण भी जाने पहचाने लगते हैं, तो ध्यान देना समझदारी है.
थाली में क्या बदलें
यहां मकसद डेयरी को पूरी तरह हटाना नहीं, बल्कि यह समझना है कि शरीर कितनी मात्रा आराम से संभाल पाता है.
एक बार में मात्रा कम कीजिए. एक पूरे गिलास की जगह आधा गिलास दूध, या दिन भर में छोटी छोटी मात्रा में डेयरी लेना कई लोगों के लिए आसान रहता है.
खाली पेट डेयरी से बचिए. खाने के साथ या किसी और चीज़ के साथ दूध लेना अकेले खाली पेट दूध पीने से ज़्यादा आराम से पचता है.
दही और पनीर को प्राथमिकता दीजिए. इनमें लैक्टोज़ की मात्रा सामान्य दूध से कम होती है, इस बारे में अगले हिस्से में विस्तार से बात करते हैं.
लैक्टोज़ फ्री विकल्प आज़माइए. बाज़ार में अब लैक्टोज़ फ्री दूध और कुछ पौधे आधारित विकल्प, जैसे बादाम या सोया से बना दूध, आसानी से मिल जाते हैं.
कैल्शियम का ध्यान रखिए. अगर डेयरी की मात्रा जानबूझकर कम कर रहे हैं, तो तिल, रागी, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां और दालों जैसे कैल्शियम के दूसरे स्रोत थाली में ज़रूर बने रहने चाहिए, ताकि हड्डियों से जुड़ी कोई कमी न बने.