लैक्टोज़ इनटॉलरेंस के लक्षण और घरेलू उपाय: दूध से एलर्जी में फर्क, थाली में बदलाव और जांच की पूरी बात

SuperLiving Expert Team·

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस के लक्षण और घरेलू उपाय: दूध से एलर्जी में फर्क, थाली में बदलाव और जांच की पूरी बात

छोटा जवाब

अगर दूध पीने के कुछ ही देर बाद पेट में गैस, मरोड़ या हल्का दस्त जैसा महसूस होता है, और चाय में थोड़ा सा दूध ठीक रहता है पर एक पूरा गिलास दूध पीते ही पेट बिगड़ जाता है, तो लैक्टोज़ इनटॉलरेंस उन वजहों में से है जिन्हें समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है.

इसका मतलब यह नहीं कि डेयरी पूरी तरह बंद करनी पड़ेगी. ज़्यादातर मामलों में थाली में छोटे बदलाव, जैसे एक बार में दूध की मात्रा कम करना, दही और पनीर जैसी फर्मेंटेड डेयरी को प्राथमिकता देना, और खाली पेट के बजाय खाने के साथ डेयरी लेना, काफी फर्क डाल देते हैं. अगर लक्षण साफ और बार बार दिखते हैं, तो एक साधारण जांच या कुछ हफ्तों की एलिमिनेशन डाइट यह साफ कर देती है कि असली वजह लैक्टोज़ है या कुछ और.

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस है क्या और शरीर में ऐसा क्यों होता है

दूध और डेयरी में एक खास तरह की शक्कर होती है जिसे लैक्टोज़ कहते हैं. इसे तोड़ने के लिए शरीर को एक एंजाइम चाहिए होता है, जिसे लैक्टेज़ कहा जाता है, और यह एंजाइम छोटी आंत में बनता है.

बचपन में ज़्यादातर लोगों में यह एंजाइम भरपूर मात्रा में बनता है, क्योंकि उस उम्र में मां का दूध ही मुख्य खाना होता है. उम्र बढ़ने के साथ साथ बहुत से लोगों में शरीर यह एंजाइम बनाना धीरे धीरे कम कर देता है. जब लैक्टेज़ कम बनता है, तो लैक्टोज़ छोटी आंत में बिना टूटे आगे बड़ी आंत तक पहुंच जाता है. वहां मौजूद बैक्टीरिया इसे किण्वित यानी फर्मेंट करते हैं, और इसी प्रक्रिया से गैस, पानी खिंचाव और पेट में मरोड़ जैसी शिकायतें शुरू होती हैं.

यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि एक बहुत आम शारीरिक बदलाव है, और भारत सहित एशिया के बड़े हिस्से में यह पश्चिमी देशों के मुकाबले कहीं ज़्यादा आम पाया गया है.

लक्षण कौन से हैं और दूध पीने के कितनी देर बाद दिखते हैं

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस के लक्षण आमतौर पर डेयरी खाने या पीने के तीस मिनट से दो घंटे के बीच दिखना शुरू होते हैं, और यह समय और तीव्रता दोनों इस बात पर निर्भर करते हैं कि शरीर में लैक्टेज़ कितना कम बना है और कितनी मात्रा में डेयरी ली गई है.

पेट में गैस और फुलावट. खाने के बाद पेट भारी और फूला हुआ महसूस होना, यह सबसे पहली और सबसे आम शिकायत है.

पेट में मरोड़ या ऐंठन. नाभि के आसपास या पूरे पेट में हल्का से लेकर तेज़ दर्द, जो अक्सर गैस निकलने या शौच के बाद कम होता है.

दस्त या ढीला मल. खास तौर पर ज़्यादा मात्रा में दूध पीने के बाद, कई बार पानी जैसा दस्त भी हो सकता है.

बार बार डकार और गैस निकलना. यह अकेला लक्षण ज़्यादा परेशान नहीं करता, पर बाकी शिकायतों के साथ मिलकर पूरी तस्वीर साफ करता है.

कुछ लोगों में जी मिचलाना. खास तौर पर जब डेयरी की मात्रा सामान्य से ज़्यादा ली गई हो.

ध्यान रहे कि हर व्यक्ति की सहनशक्ति अलग होती है. कुछ लोग एक कप चाय में मौजूद थोड़े से दूध को आराम से पचा लेते हैं, पर एक पूरा गिलास दूध उन्हें परेशान कर देता है. यह मात्रा पर निर्भर करने वाली समस्या है, पूरी तरह सब कुछ या कुछ नहीं वाली बात नहीं.

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस और दूध से एलर्जी में फर्क कैसे समझें

यह वह जगह है जहां सबसे ज़्यादा उलझन होती है, और दोनों को एक मान लेना गलत कदमों की तरफ ले जा सकता है.

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस पाचन से जुड़ी समस्या है. इसमें शरीर लैक्टोज़ नाम की शक्कर को ठीक से तोड़ नहीं पाता, और इसके लक्षण मुख्य रूप से पेट तक सीमित रहते हैं, जैसे गैस, मरोड़ और दस्त. यह जानलेवा नहीं होती और मात्रा कम करके या थोड़ा इंतज़ार करके आमतौर पर अपने आप ठीक हो जाती है.

दूध से एलर्जी पूरी तरह अलग चीज़ है. यह शरीर की रोग प्रतिरोधक व्यवस्था से जुड़ी प्रतिक्रिया है, जिसमें शरीर दूध में मौजूद प्रोटीन को खतरा समझ लेता है. इसके लक्षण सिर्फ पेट तक सीमित नहीं रहते, इसमें त्वचा पर चकत्ते, होंठ या चेहरे पर सूजन, सांस लेने में दिक्कत और कुछ गंभीर मामलों में पूरे शरीर की तेज़ प्रतिक्रिया भी शामिल हो सकती है. यह स्थिति गंभीर हो सकती है और तुरंत मेडिकल ध्यान मांगती है.

फर्क समझने का एक आसान तरीका यह है कि लैक्टोज़ इनटॉलरेंस में दूध की थोड़ी मात्रा आमतौर पर बर्दाश्त हो जाती है, जबकि असली दूध एलर्जी में थोड़ी सी मात्रा भी प्रतिक्रिया शुरू कर सकती है. अगर पेट की शिकायतों के साथ त्वचा, सांस या सूजन से जुड़े लक्षण भी दिखें, तो इसे घर पर समझने की कोशिश करने के बजाय डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है.

जानकारी काफी नहीं होती, रोज़ निभाना असली काम है. SuperLiving पर 20+ कोच हिंदी और हिंग्लिश में आपकी थाली, आपकी सहनशक्ति और आपकी दिनचर्या के हिसाब से छोटे कदम तय करते हैं, ताकि डेयरी से जुड़े बदलाव एक और लंबी सूची न बनकर रोज़ निभाने लायक आदत बनें. SuperLiving डाउनलोड करें

किन लोगों में यह समस्या ज़्यादा आम है

वयस्क होने के बाद ज़्यादातर भारतीय आबादी में लैक्टेज़ का बनना स्वाभाविक रूप से कम होता है, इसलिए यह समस्या यहां अपेक्षाकृत आम मानी जाती है. जिन लोगों के परिवार में पहले से किसी को यह शिकायत रही हो, उनमें भी खतरा ज़्यादा रहता है. जिन्हें पेट या आंत से जुड़ी कोई और स्थिति रही हो, जैसे किसी संक्रमण के बाद आंत की परत कमज़ोर पड़ जाना, उनमें भी अस्थायी रूप से लैक्टोज़ सहनशक्ति घट सकती है. उम्र बढ़ने के साथ भी यह समस्या धीरे धीरे बढ़ती देखी जाती है.

इसका मतलब यह नहीं कि बचपन में डेयरी ठीक से पचाने वाला हर व्यक्ति उम्र के साथ ज़रूर इस समस्या का शिकार होगा, पर अगर ऊपर बताए समूह में आप आते हैं और लक्षण भी जाने पहचाने लगते हैं, तो ध्यान देना समझदारी है.

थाली में क्या बदलें

यहां मकसद डेयरी को पूरी तरह हटाना नहीं, बल्कि यह समझना है कि शरीर कितनी मात्रा आराम से संभाल पाता है.

एक बार में मात्रा कम कीजिए. एक पूरे गिलास की जगह आधा गिलास दूध, या दिन भर में छोटी छोटी मात्रा में डेयरी लेना कई लोगों के लिए आसान रहता है.

खाली पेट डेयरी से बचिए. खाने के साथ या किसी और चीज़ के साथ दूध लेना अकेले खाली पेट दूध पीने से ज़्यादा आराम से पचता है.

दही और पनीर को प्राथमिकता दीजिए. इनमें लैक्टोज़ की मात्रा सामान्य दूध से कम होती है, इस बारे में अगले हिस्से में विस्तार से बात करते हैं.

लैक्टोज़ फ्री विकल्प आज़माइए. बाज़ार में अब लैक्टोज़ फ्री दूध और कुछ पौधे आधारित विकल्प, जैसे बादाम या सोया से बना दूध, आसानी से मिल जाते हैं.

कैल्शियम का ध्यान रखिए. अगर डेयरी की मात्रा जानबूझकर कम कर रहे हैं, तो तिल, रागी, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां और दालों जैसे कैल्शियम के दूसरे स्रोत थाली में ज़रूर बने रहने चाहिए, ताकि हड्डियों से जुड़ी कोई कमी न बने.

यह सब खुद करने की ज़रूरत नहीं है

SuperLiving पर 20+ expert coaches आपकी थाली के हिसाब से प्लान बनाते हैं. शुरुआत फ्री.

फ्री में शुरू करें

दही, पनीर और फर्मेंटेड डेयरी की बात अलग क्यों है

बहुत से लोग जो एक गिलास दूध से परेशान होते हैं, वे दही या पनीर आराम से खा लेते हैं, और इसके पीछे एक साफ वजह है.

दही बनने की प्रक्रिया में मौजूद बैक्टीरिया दूध के लैक्टोज़ का एक हिस्सा पहले ही तोड़ चुके होते हैं, इसलिए दही में लैक्टोज़ की मात्रा सामान्य दूध से कम रहती है. पनीर बनाते समय भी दूध का पानी वाला हिस्सा, जिसमें ज़्यादातर लैक्टोज़ होता है, अलग निकल जाता है, इसलिए पनीर में भी लैक्टोज़ अपेक्षाकृत कम बचता है.

इसका मतलब यह नहीं कि दही और पनीर हर किसी के लिए बिना किसी सीमा के ठीक रहेंगे, पर ज़्यादातर मामलों में इन्हें शुरुआत के तौर पर आज़माना दूध के मुकाबले आसान विकल्प है. मलाई रहित दही और ताज़ा पनीर आमतौर पर ज़्यादा मलाईदार या पुरानी चीज़ों के मुकाबले हल्के पड़ते हैं.

जांच कैसे होती है

ज़्यादातर लोगों के लिए लक्षण और पैटर्न देखकर ही अंदाज़ा लग जाता है, खास तौर पर जब दूध की मात्रा और लक्षणों के समय का साफ रिश्ता दिखे. फिर भी अगर तस्वीर साफ नहीं है, तो डॉक्टर कुछ तरीके सुझा सकते हैं.

सबसे आम तरीका एलिमिनेशन है, जिसमें कुछ हफ्तों के लिए डेयरी को थाली से काफी हद तक हटाकर देखा जाता है कि लक्षणों में फर्क पड़ता है या नहीं, और फिर धीरे धीरे वापस शामिल करके सहनशक्ति समझी जाती है. इसके अलावा हाइड्रोजन ब्रेथ टेस्ट नाम की एक जांच भी होती है, जिसमें सांस में हाइड्रोजन की मात्रा नापकर यह पता लगाया जाता है कि लैक्टोज़ ठीक से पच रहा है या नहीं. यह दोनों तरीके डॉक्टर की निगरानी में करना ज़्यादा भरोसेमंद रहता है, खास तौर पर अगर लक्षण तेज़ या लगातार बने हुए हों.

जो गलतियां लोग अक्सर करते हैं

हर पेट दर्द को लैक्टोज़ इनटॉलरेंस मान लेना. गैस, मरोड़ और दस्त कई और वजहों से भी होते हैं, जैसे सामान्य पाचन से जुड़ी गड़बड़ी या किसी और खाने की चीज़ से परेशानी. अगर दूध के अलावा और भी कई चीज़ों से पेट बिगड़ता है, तो उस पर अलग से ध्यान देना चाहिए, और इसके लिए गैस और ब्लोटिंग के घरेलू उपाय पढ़ना एक अच्छी अगली शुरुआत है.

डेयरी पूरी तरह और अचानक बंद कर देना. धीरे धीरे मात्रा घटाने और शरीर की प्रतिक्रिया देखने का तरीका ज़्यादा काम का साबित होता है.

बिना सोचे हर डेयरी चीज़ को एक जैसा मान लेना. दूध, दही, पनीर और मलाई में लैक्टोज़ की मात्रा अलग अलग होती है, इसलिए एक चीज़ से दिक्कत का मतलब यह नहीं कि बाकी सब भी वैसी ही तकलीफ देंगी.

कैल्शियम की ज़रूरत को नज़रअंदाज़ करना. डेयरी कम करते समय अगर उसकी जगह कुछ और कैल्शियम वाला नहीं जोड़ा गया, तो यह हिस्सा लंबे समय में हड्डियों पर असर डाल सकता है.

दो हफ्ते का आसान प्लान

पहला हफ्ता, सिर्फ दो बदलाव. एक बार में दूध की मात्रा आधी कर दीजिए, और उसे हमेशा खाने के साथ या नाश्ते के साथ लीजिए, खाली पेट नहीं. साथ ही एक लाइन में रोज़ नोट कीजिए कि कितना दूध लिया और पेट कैसा रहा.

दूसरा हफ्ता, दही और पनीर आज़माइए. अगर पहले हफ्ते में दूध से दिक्कत बनी रही, तो उसकी जगह उतनी ही मात्रा में दही या पनीर शामिल करके देखिए कि फर्क पड़ता है या नहीं.

नापने का तरीका. दो हफ्ते बाद अपने नोट्स पढ़िए और देखिए कि किस मात्रा और किस तरह की डेयरी पर पेट सबसे ज़्यादा आराम से रहा. यही पैटर्न आपकी आगे की थाली का आधार बनेगा.

कब डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है

अगर पेट दर्द बहुत तेज़ है, अगर दस्त कई दिनों तक लगातार बना रहता है, अगर मल में खून दिखे, अगर बिना वजह वज़न कम होने लगे, या अगर पेट की शिकायतों के साथ त्वचा पर चकत्ते, सूजन या सांस लेने में दिक्कत जैसे लक्षण भी दिखें, तो यह घरेलू समझ का दायरा नहीं है और डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है. बच्चों में भी अगर यह शिकायत दिखे, तो बिना डॉक्टर की सलाह के थाली में बड़े बदलाव नहीं करने चाहिए, क्योंकि बढ़ते शरीर के लिए कैल्शियम और बाकी पोषण का हिसाब अलग तरह से देखना पड़ता है.

मिलाकर बात यह है

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस कोई बीमारी नहीं, बल्कि उम्र के साथ आने वाला एक बहुत आम बदलाव है, और इसे समझना ज़्यादातर मामलों में आसान है. दूध की मात्रा थोड़ी कम कीजिए, इसे खाली पेट लेने से बचिए, दही और पनीर को मौका दीजिए, और कैल्शियम के दूसरे स्रोतों का ध्यान रखिए. अगर पैटर्न साफ नहीं है या लक्षण तेज़ हैं, तो एलिमिनेशन या जांच से तस्वीर साफ हो जाती है.

मुश्किल हिस्सा जानकारी नहीं है, मुश्किल हिस्सा यह है कि थाली में यह छोटे बदलाव हफ्ते दर हफ्ते बने रहें. SuperLiving पर 20+ कोच हिंदी और हिंग्लिश में आपकी थाली और आपकी सहनशक्ति के हिसाब से इसे छोटे कदमों में बांटते हैं, ताकि डेयरी से जुड़ी उलझन एक और लंबी सूची नहीं बल्कि रोज़ निभाने लायक तरीका बने. पाचन से जुड़ी बाकी आदतें सुधारने के लिए पाचन कैसे सुधारें भी एक उपयोगी अगला कदम है.

SuperLiving डाउनलोड करें और कोच से बात करें


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस के लक्षण दूध पीने के कितनी देर बाद दिखते हैं? लक्षण आमतौर पर डेयरी लेने के तीस मिनट से दो घंटे के बीच दिखना शुरू होते हैं. सबसे पहले पेट में गैस और फुलावट महसूस होती है, उसके साथ नाभि के आसपास हल्की से लेकर तेज़ मरोड़ भी हो सकती है. कई लोगों को ढीला मल या पानी जैसा दस्त भी होता है, खास तौर पर जब मात्रा सामान्य से ज़्यादा ली गई हो.

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस और दूध से एलर्जी में क्या फर्क है? लैक्टोज़ इनटॉलरेंस पाचन से जुड़ी समस्या है, जिसमें शरीर दूध की शक्कर को ठीक से तोड़ नहीं पाता और लक्षण मुख्य रूप से पेट तक सीमित रहते हैं. दूध से एलर्जी रोग प्रतिरोधक व्यवस्था से जुड़ी प्रतिक्रिया है, जिसमें शरीर दूध के प्रोटीन को खतरा समझ लेता है, और इसके लक्षण त्वचा, सूजन या सांस तक जा सकते हैं. पेट के साथ ऐसे लक्षण दिखने पर डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है.

क्या लैक्टोज़ इनटॉलरेंस में दही और पनीर खाए जा सकते हैं? ज़्यादातर मामलों में हां. दही बनने की प्रक्रिया में मौजूद बैक्टीरिया दूध के लैक्टोज़ का एक हिस्सा पहले ही तोड़ चुके होते हैं, इसलिए दही में लैक्टोज़ कम रहता है. पनीर बनाते समय भी दूध का पानी वाला हिस्सा अलग निकल जाता है, इसलिए पनीर में भी लैक्टोज़ अपेक्षाकृत कम बचता है, पर मात्रा फिर भी व्यक्ति पर निर्भर करती है.

क्या लैक्टोज़ इनटॉलरेंस की जांच कराना ज़रूरी है? ज़्यादातर लोगों के लिए पैटर्न देखकर ही अंदाज़ा लग जाता है. अगर तस्वीर साफ नहीं है, तो डॉक्टर एलिमिनेशन डाइट या हाइड्रोजन ब्रेथ टेस्ट नाम की जांच सुझा सकते हैं, जिसमें सांस में हाइड्रोजन नापकर पता लगाया जाता है कि लैक्टोज़ ठीक से पच रहा है या नहीं. लक्षण तेज़ या लगातार बने रहने पर जांच डॉक्टर की निगरानी में कराना बेहतर रहता है.

क्या लैक्टोज़ इनटॉलरेंस में डेयरी पूरी तरह बंद करनी चाहिए? ज़्यादातर मामलों में पूरी तरह बंद करने की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि यह मात्रा पर निर्भर करने वाली समस्या है. मात्रा कम करना, खाली पेट डेयरी से बचना, और दही-पनीर जैसे विकल्पों को प्राथमिकता देना कई लोगों के लिए काफी फर्क डाल देता है. डेयरी जानबूझकर कम करने पर तिल, रागी, हरी सब्ज़ियां और दालों जैसे कैल्शियम के दूसरे स्रोत थाली में बने रहने चाहिए.

क्या बच्चों में भी लैक्टोज़ इनटॉलरेंस होता है? हो सकता है, हालांकि यह वयस्कों में ज़्यादा आम है क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ लैक्टेज़ एंजाइम का बनना स्वाभाविक रूप से कम होता जाता है. बच्चों में बार बार पेट की शिकायत, दस्त या वज़न बढ़ने में दिक्कत दिखे, तो इसे घर पर अंदाज़े से संभालने के बजाय डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है.

SuperLiving जीवनशैली और वेलनेस सहायता देता है और यह चिकित्सकीय सलाह, निदान या इलाज का विकल्प नहीं है. अगर दूध या डेयरी के बाद तेज़ पेट दर्द, लगातार दस्त, मल में खून, बिना वजह वज़न कम होना, या त्वचा-सूजन-सांस से जुड़े लक्षण दिखें, तो कृपया योग्य डॉक्टर से सलाह लें. बच्चों में इस तरह की शिकायत होने पर थाली में बड़े बदलाव डॉक्टर की सलाह के बिना न करें.

SuperLiving

अपना डाइट प्लान 2 मिनट में बनाएं

घर का खाना खाकर वजन कम करें. 20+ expert coaches से हिंदी में बात करें, जब चाहें. शुरुआत फ्री, उसके बाद ₹199 प्रति महीना.

फ्री में शुरू करें

10 लाख+ डाउनलोड, Google Play पर उपलब्ध

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस के लक्षण दूध पीने के कितनी देर बाद दिखते हैं?+

लक्षण आमतौर पर डेयरी लेने के तीस मिनट से दो घंटे के बीच दिखना शुरू होते हैं. सबसे पहले पेट में गैस और फुलावट महसूस होती है, उसके साथ नाभि के आसपास हल्की से लेकर तेज़ मरोड़ भी हो सकती है. कई लोगों को ढीला मल या पानी जैसा दस्त भी होता है, खास तौर पर जब मात्रा सामान्य से ज़्यादा ली गई हो. समय और तीव्रता दोनों इस पर निर्भर करते हैं कि शरीर में लैक्टेज़ एंजाइम कितना कम बना है और कितनी डेयरी एक बार में ली गई है.

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस और दूध से एलर्जी में क्या फर्क है?+

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस पाचन से जुड़ी समस्या है, जिसमें शरीर दूध की शक्कर को ठीक से तोड़ नहीं पाता और लक्षण मुख्य रूप से पेट तक सीमित रहते हैं, जैसे गैस, मरोड़ और दस्त. दूध से एलर्जी रोग प्रतिरोधक व्यवस्था से जुड़ी प्रतिक्रिया है, जिसमें शरीर दूध के प्रोटीन को खतरा समझ लेता है, और इसके लक्षण त्वचा पर चकत्ते, सूजन या सांस लेने में दिक्कत तक जा सकते हैं. लैक्टोज़ इनटॉलरेंस में थोड़ी मात्रा अक्सर बर्दाश्त हो जाती है, जबकि असली एलर्जी में थोड़ी सी मात्रा भी प्रतिक्रिया शुरू कर सकती है, इसलिए पेट के साथ त्वचा या सांस से जुड़े लक्षण दिखने पर डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है.

क्या लैक्टोज़ इनटॉलरेंस में दही और पनीर खाए जा सकते हैं?+

ज़्यादातर मामलों में हां, और इसके पीछे एक साफ वजह है. दही बनने की प्रक्रिया में मौजूद बैक्टीरिया दूध के लैक्टोज़ का एक हिस्सा पहले ही तोड़ चुके होते हैं, इसलिए दही में लैक्टोज़ सामान्य दूध से कम रहता है. पनीर बनाते समय भी दूध का पानी वाला हिस्सा, जिसमें ज़्यादातर लैक्टोज़ होता है, अलग निकल जाता है. इसका मतलब यह नहीं कि यह हर किसी के लिए बिना किसी सीमा के ठीक रहेंगे, पर शुरुआत के तौर पर इन्हें आज़माना दूध के मुकाबले आसान विकल्प है.

क्या लैक्टोज़ इनटॉलरेंस की जांच कराना ज़रूरी है?+

ज़्यादातर लोगों के लिए दूध की मात्रा और लक्षणों के समय का पैटर्न देखकर ही अंदाज़ा लग जाता है. अगर तस्वीर साफ नहीं है, तो डॉक्टर एलिमिनेशन डाइट सुझा सकते हैं, जिसमें कुछ हफ्तों के लिए डेयरी कम करके फर्क देखा जाता है, या हाइड्रोजन ब्रेथ टेस्ट नाम की जांच करवाई जा सकती है, जिसमें सांस में हाइड्रोजन नापकर पता लगाया जाता है कि लैक्टोज़ ठीक से पच रहा है या नहीं. लक्षण तेज़ या लगातार बने रहने पर यह जांच डॉक्टर की निगरानी में कराना ज़्यादा भरोसेमंद रहता है.

क्या लैक्टोज़ इनटॉलरेंस में डेयरी पूरी तरह बंद करनी चाहिए?+

ज़्यादातर मामलों में पूरी तरह बंद करने की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि यह मात्रा पर निर्भर करने वाली समस्या है, सब कुछ या कुछ नहीं वाली बात नहीं. एक बार में मात्रा कम करना, खाली पेट डेयरी से बचना, और दही-पनीर जैसे विकल्पों को प्राथमिकता देना कई लोगों के लिए काफी फर्क डाल देता है. अगर जानबूझकर डेयरी कम की जा रही है, तो तिल, रागी, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां और दालों जैसे कैल्शियम के दूसरे स्रोत थाली में बने रहने चाहिए.

क्या बच्चों में भी लैक्टोज़ इनटॉलरेंस होता है?+

हो सकता है, हालांकि यह वयस्कों में ज़्यादा आम है क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ लैक्टेज़ एंजाइम का बनना स्वाभाविक रूप से कम होता जाता है. बच्चों में अगर दूध के बाद बार बार पेट की शिकायत, दस्त या वज़न बढ़ने में दिक्कत दिखे, तो इसे घर पर अंदाज़े से संभालने के बजाय डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है, क्योंकि बढ़ते शरीर के लिए कैल्शियम और बाकी पोषण का हिसाब अलग तरह से देखना पड़ता है.

आगे पढ़ें

विटामिन और पोषण पर सभी 17 आर्टिकल देखें →
← सभी articles देखें