विटामिन डी की कमी के लक्षण और घरेलू उपाय: धूप, खाना और जांच की पूरी बात
छोटा जवाब
अगर आप महीनों से बिना वजह थकान महसूस कर रहे हैं, पैरों और कमर में हल्का दर्द बना रहता है, सीढ़ियां चढ़ने पर पहले से जल्दी थक जाते हैं, और नींद पूरी करने के बाद भी शरीर भारी लगता है, तो विटामिन डी की कमी उन कुछ वजहों में से है जिन्हें जांचना सबसे आसान है और नज़रअंदाज़ सबसे ज़्यादा किया जाता है.
सबसे बड़ा उपाय कोई महंगी चीज़ नहीं है. हफ्ते में तीन से चार दिन, सुबह दस से दोपहर तीन के बीच, 15 से 30 मिनट धूप, और शर्त यह कि हाथ पैर सीधे धूप में खुले हों. खाने से थाली में अंडे की जर्दी, तैलीय मछली और फोर्टिफाइड दूध जोड़िए, साथ में कैल्शियम और प्रोटीन का ध्यान रखिए. और अगर लक्षण साफ हैं तो एक साधारण खून की जांच कराइए, क्योंकि अंदाज़े से सप्लीमेंट शुरू करना इस विटामिन के मामले में खास तौर पर गलत फैसला है.
विटामिन डी असल में करता क्या है
ज़्यादातर लोग विटामिन डी को सिर्फ हड्डियों से जोड़ते हैं. यह सही है, लेकिन अधूरा है.
इसका सबसे जाना पहचाना काम यह है कि यह आंतों को कैल्शियम सोखने में मदद करता है. यानी आप कितना भी दूध, दही या हरी सब्ज़ी खा लें, अगर विटामिन डी कम है तो उसमें से कैल्शियम का बड़ा हिस्सा शरीर के काम नहीं आता. इसीलिए कई लोग सालों से कैल्शियम पर ध्यान देने के बावजूद हड्डियों की कमज़ोरी की शिकायत करते हैं.
दूसरा काम मांसपेशियों से जुड़ा है. विटामिन डी मांसपेशियों के काम करने के तरीके को प्रभावित करता है, और कमी की स्थिति में सबसे पहले शरीर के बीच वाले हिस्से की बड़ी मांसपेशियां प्रभावित होती हैं, यानी जांघें और कूल्हे. यही वजह है कि कमी वाले लोग अक्सर कहते हैं कि कुर्सी से उठने या सीढ़ी चढ़ने में पहले जैसी ताकत नहीं लगती.
तीसरा हिस्सा कम चर्चा में रहता है. विटामिन डी शरीर की रोग प्रतिरोधक व्यवस्था के काम में भी भूमिका निभाता है, और कई अध्ययनों में इसका संबंध मन की स्थिति और मौसमी उदासी से भी जोड़ा गया है. यहां सावधानी ज़रूरी है, क्योंकि संबंध दिखना और कारण होना दो अलग बातें हैं. विटामिन डी उदासी का इलाज नहीं है, लेकिन अगर कमी मौजूद है तो उसे ठीक करना बाकी कोशिशों को आसान बना देता है.
कमी के लक्षण जो लोग नज़रअंदाज़ कर देते हैं
विटामिन डी की कमी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके लक्षण किसी एक बीमारी जैसे नहीं लगते. वे धीरे धीरे आते हैं और रोज़ की ज़िंदगी में घुल जाते हैं.
लगातार थकान जो नींद से नहीं जाती. यह सबसे आम शिकायत है. सात घंटे सोने के बाद भी सुबह शरीर भारी लगना, और दोपहर तक ऊर्जा का खत्म हो जाना.
पैरों, कमर और एड़ी में बिना चोट का दर्द. खास तौर पर पिंडलियों और जांघों में हल्का, फैला हुआ दर्द जो किसी एक जगह पर उंगली रखकर नहीं दिखाया जा सकता. घुटनों के दर्द के और भी कारण होते हैं, उन्हें अलग से समझने के लिए घुटनों के दर्द का घरेलू उपाय पढ़ना उपयोगी रहेगा.
मांसपेशियों की कमज़ोरी. ज़मीन से उठने में सहारा लेना, सीढ़ियां चढ़ते समय पैर भारी लगना, या भारी सामान उठाने में पहले जैसी पकड़ न रहना.
बार बार बीमार पड़ना. महीने में एक बार सर्दी जुकाम, और हर बार ठीक होने में सामान्य से ज़्यादा समय.
बाल झड़ना और घाव का देर से भरना. ये अकेले विटामिन डी की तरफ इशारा नहीं करते, लेकिन बाकी लक्षणों के साथ मिलकर तस्वीर बनाते हैं.
मन का लगातार उदास या चिड़चिड़ा रहना. खास तौर पर उन लोगों में जो लंबे समय तक बंद जगहों में रहते हैं.
ध्यान दीजिए कि यह सूची किसी भी तरह से जांच की जगह नहीं ले सकती. इनमें से लगभग हर लक्षण थायराइड की गड़बड़ी, खून की कमी, नींद की कमी या तनाव में भी दिखता है. थकान और वजन का रिश्ता समझने के लिए थायराइड में वजन कैसे कम करें एक अच्छा अगला कदम है, क्योंकि दोनों स्थितियों के लक्षण काफी हद तक एक जैसे लगते हैं.
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भारत में इतनी धूप है, फिर कमी इतनी आम क्यों है
यह सवाल सबसे ज़रूरी है, क्योंकि इसका जवाब समझे बिना कोई भी उपाय काम नहीं करेगा.
पहली वजह, हम धूप में निकलते ही नहीं. सुबह अंधेरे में घर से निकलना, दिन भर बंद दफ्तर या दुकान में रहना, और शाम को अंधेरे में लौटना. जिस समय धूप विटामिन डी बनाने लायक होती है, यानी दस से तीन के बीच, ठीक उसी समय ज़्यादातर लोग छत के नीचे होते हैं.
दूसरी वजह, त्वचा का रंग. भारतीय त्वचा में मेलानिन ज़्यादा होता है, जो एक तरह की प्राकृतिक सुरक्षा है. यह त्वचा को धूप से बचाता है, लेकिन साथ ही विटामिन डी बनने की रफ्तार भी धीमी कर देता है. इसका मतलब है कि गोरी त्वचा वाले व्यक्ति के मुकाबले उतनी ही मात्रा बनाने के लिए ज़्यादा समय चाहिए.
तीसरी वजह, कपड़े और आदत. पूरा शरीर ढककर बाहर निकलना, धूप से बचने के लिए छांव चुनना, और चेहरे पर सनस्क्रीन लगाना, ये सब त्वचा तक पहुंचने वाली किरणों को घटा देते हैं.
चौथी वजह, प्रदूषण. बड़े शहरों में हवा में मौजूद कण उन किरणों को काफी हद तक रोक देते हैं जो त्वचा में विटामिन डी बनाती हैं. यही वजह है कि शहरों में रहने वालों में कमी गांव के मुकाबले ज़्यादा देखी जाती है.
पांचवीं वजह, थाली. भारतीय शाकाहारी थाली में विटामिन डी के प्राकृतिक स्रोत लगभग न के बराबर हैं. जिन देशों में दूध और अनाज में विटामिन डी मिलाना अनिवार्य है, वहां यह कमी आबादी के स्तर पर कम होती है.
किन लोगों में खतरा सबसे ज़्यादा है
दिन भर घर या दफ्तर के अंदर रहने वाले लोग, रात की शिफ्ट में काम करने वाले, बुज़ुर्ग जिनकी त्वचा में विटामिन डी बनाने की क्षमता उम्र के साथ घटती है, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं, ज़्यादा वजन वाले लोग क्योंकि यह विटामिन शरीर की चर्बी में जमा हो जाता है, पूरी तरह शाकाहारी खाना खाने वाले लोग, और वे लोग जिन्हें पेट या आंत से जुड़ी कोई ऐसी स्थिति है जिसमें चिकनाई सोखने में दिक्कत होती है.
अगर आप इनमें से किसी एक श्रेणी में आते हैं और ऊपर बताए लक्षणों में से दो तीन आप पर लागू होते हैं, तो अंदाज़ा लगाने के बजाय जांच करा लेना सबसे सस्ता रास्ता है.
धूप से विटामिन डी कैसे बनाएं, सही तरीका
यह सबसे मुफ्त और सबसे गलत तरीके से किया जाने वाला उपाय है.
समय: सुबह दस बजे से दोपहर तीन बजे के बीच. सुबह सात बजे की नरम धूप मन को अच्छी लगती है और नींद के चक्र के लिए बहुत उपयोगी है, लेकिन उसमें विटामिन डी बनाने वाली किरणें बहुत कम होती हैं.
अवधि: हफ्ते में तीन से चार दिन, 15 से 30 मिनट. गहरे रंग की त्वचा वालों को इससे ज़्यादा समय चाहिए हो सकता है.
त्वचा का हिस्सा: सिर्फ चेहरा काफी नहीं. हाथ, बांहें और हो सके तो पैर या पीठ का हिस्सा खुला होना चाहिए. जितना क्षेत्रफल खुला होगा, उतना कम समय लगेगा.
क्या काम नहीं करता: खिड़की के कांच के पीछे बैठकर ली गई धूप, क्योंकि कांच उन किरणों को रोक देता है. छांव में बैठना. और घंटों धूप में बैठे रहना, क्योंकि एक सीमा के बाद शरीर और नहीं बनाता, बस त्वचा को नुकसान होता है.
संतुलन: अगर आपकी त्वचा संवेदनशील है, या त्वचा से जुड़ी कोई स्थिति है, तो धूप का समय बढ़ाने से पहले डॉक्टर से बात कीजिए. लंबे समय तक बिना सुरक्षा के तेज़ धूप त्वचा के लिए ठीक नहीं है, इसलिए यहां लक्ष्य नियमितता है, ज़्यादा मात्रा नहीं.
खाने से कितना मिल सकता है
ईमानदार जवाब यह है कि आम भारतीय थाली से पूरी ज़रूरत नहीं भरती, लेकिन थाली को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता.
अंडे की जर्दी. सबसे आसान और सस्ता स्रोत. जर्दी अलग करके फेंकने की आदत यहां नुकसान करती है, क्योंकि विटामिन डी जर्दी में ही होता है.
तैलीय मछली. रावस, बांगड़ा, सुरमई और सैलमन जैसी मछलियां सबसे अच्छे प्राकृतिक स्रोतों में गिनी जाती हैं.
फोर्टिफाइड दूध, दही और तेल. पैकेट पर लिखा देखिए. कई ब्रांड अब दूध और खाने के तेल में विटामिन डी मिलाते हैं.
मशरूम. खास तौर पर वे जो धूप में सुखाए गए हों. शाकाहारी लोगों के लिए यह उन गिने चुने विकल्पों में है जो कुछ मात्रा देते हैं.
साथ में कैल्शियम और प्रोटीन. दूध, दही, पनीर, रागी, तिल, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां और दालें. इनका काम विटामिन डी की जगह लेना नहीं है, बल्कि यह पक्का करना है कि जो विटामिन डी शरीर में है वह किसी काम आए.
मैग्नीशियम भी मायने रखता है. कद्दू के बीज, बादाम, मूंगफली और साबुत अनाज. शरीर को विटामिन डी को उपयोगी रूप में बदलने के लिए मैग्नीशियम चाहिए होता है, और यह हिस्सा अक्सर छूट जाता है.