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जोड़ों के दर्द के लिए डाइट: सूजन कम करने वाला खाना और पूरे दिन का चार्ट

SuperLiving Expert Team·

जोड़ों के दर्द के लिए डाइट: सूजन कम करने वाला खाना और पूरे दिन का चार्ट

छोटा जवाब

जोड़ों के दर्द में खाने का काम दर्द को सीधे मिटाना नहीं है. उसका काम तीन चीज़ें करना है: शरीर में बनी रहने वाली हल्की सूजन को कम करना, वजन को उस दिशा में ले जाना जिससे जोड़ पर दबाव घटे, और मांसपेशी को इतना मज़बूत रखना कि पूरा भार जोड़ पर न आए.

इसका मतलब व्यावहारिक भाषा में यह है: हर भोजन में एक साफ प्रोटीन वाला हिस्सा, रोज़ की थाली में हरी सब्ज़ी और रंगीन सब्ज़ियां, हफ्ते में तीन चार दिन ओमेगा वाली चीज़ें जैसे अलसी, अखरोट या मछली, हल्दी और अदरक को खाने का नियमित हिस्सा बनाना, और दूसरी तरफ मैदा, तली हुई चीज़ें, मीठे पेय और बहुत ज़्यादा प्रोसेस्ड नमकीन को कम करना.

आगे इसी को पूरे दिन के चार्ट में बांटा गया है, शाकाहारी और मांसाहारी दोनों विकल्पों के साथ.

जोड़ों का दर्द और खाना, रिश्ता असल में क्या है

पहले यह साफ कर लेना ज़रूरी है कि जोड़ों का दर्द एक चीज़ नहीं है.

कुछ लोगों में यह उम्र और घिसाव की वजह से होता है, जहां जोड़ की गद्दी धीरे धीरे कमज़ोर होती है. कुछ में यह शरीर की अपनी प्रतिरोधक व्यवस्था की गड़बड़ी से आता है, जहां सूजन और जकड़न मुख्य शिकायत होती है. कुछ में यह यूरिक एसिड बढ़ने से आता है, जहां दर्द अचानक और बहुत तेज़ होता है. और बहुत बड़ी संख्या में लोगों में यह बस भार, कमज़ोर मांसपेशी और बैठे रहने की आदत का नतीजा होता है.

खाने का असर इन सब में एक जैसा नहीं होता. लेकिन एक चीज़ लगभग सब में साझा है, और वह है शरीर में लगातार बनी रहने वाली हल्की सूजन. यह वैसी सूजन नहीं जो चोट लगने पर दिखती है, यह धीमी और लंबे समय तक चलने वाली स्थिति है, जिसे थाली रोज़ थोड़ा बढ़ा भी सकती है और थोड़ा घटा भी सकती है.

इसलिए इस लेख का पूरा ढांचा यही है: जो चीज़ें इस धीमी सूजन को बढ़ाती हैं उन्हें कम करना, और जो घटाती हैं उन्हें रोज़ की थाली का हिस्सा बनाना.

सबसे बड़ा लीवर जिस पर सबसे कम बात होती है

अगर आपके जोड़ों में दर्द है और आपका वजन ज़रूरत से ज़्यादा है, तो सबसे ताकतवर बदलाव कोई खास मसाला या कोई खास सब्ज़ी नहीं है. वह वजन है.

वजह सीधी है. चलते समय घुटने पर शरीर के वजन का कई गुना दबाव पड़ता है, और सीढ़ी उतरते समय यह और बढ़ जाता है. यानी थोड़ी सी भी कमी रोज़ के कुल दबाव को काफी घटा देती है, क्योंकि यह हर कदम पर गुणा होकर काम करता है.

लेकिन यहां एक शर्त है जिसे लोग अक्सर तोड़ देते हैं. वजन इस तरह नहीं घटना चाहिए कि मांसपेशी भी साथ चली जाए. बहुत कम खाकर तेज़ी से वजन घटाने में प्रोटीन कम पड़ता है और जोड़ को सहारा देने वाली व्यवस्था और कमज़ोर हो जाती है.

इसलिए यहां तरीका धीमा और प्रोटीन वाला होना चाहिए. पूरे दिन का संतुलित ढांचा कैसा दिखता है, यह समझने के लिए वजन घटाने का डाइट चार्ट एक अच्छा साथी लेख है, क्योंकि जोड़ों के लिए बनाई गई थाली और वजन के लिए बनाई गई थाली में अस्सी प्रतिशत हिस्सा एक जैसा होता है.

क्या खाना चाहिए, और क्यों

हरी और रंगीन सब्ज़ियां

पालक, मेथी, सरसों, बथुआ, लौकी, तोरई, गाजर, चुकंदर, शिमला मिर्च. इनका काम सिर्फ विटामिन देना नहीं है. इनमें मौजूद तत्व शरीर में उस नुकसान को कम करते हैं जो लंबे समय तक चलने वाली सूजन के साथ चलता है. रोज़ की थाली में कम से कम दो अलग रंग की सब्ज़ी होनी चाहिए, और उनमें से एक हरी पत्तेदार.

ओमेगा वाली चिकनाई

यह वह हिस्सा है जो भारतीय थाली में सबसे ज़्यादा गायब रहता है. अलसी के भुने और पिसे बीज, अखरोट, चिया के बीज, और मांसाहारी लोगों के लिए तैलीय मछली जैसे बांगड़ा, सुरमई या रावस. इस तरह की चिकनाई सूजन के रास्ते पर सीधा असर डालती है, और यह उन गिने चुने खाने के बदलावों में है जिनका जोड़ों की तकलीफ से संबंध बार बार देखा गया है. रोज़ एक चम्मच पिसी अलसी दही या दलिये में मिलाना सबसे आसान शुरुआत है.

प्रोटीन, हर भोजन में

गाढ़ी दाल, राजमा, छोले, सोयाबीन की बड़ी, पनीर, दही, दूध, भुने चने, मूंगफली, और जो खाते हैं उनके लिए अंडा और मछली. जोड़ के आसपास की मांसपेशी जितनी मज़बूत होगी, जोड़ पर सीधा भार उतना कम पड़ेगा. उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशी अपने आप घटती है, और प्रोटीन कम होने पर यह और तेज़ी से घटती है.

कैल्शियम और विटामिन डी

दूध, दही, पनीर, रागी, तिल, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां. साथ में धूप, क्योंकि विटामिन डी के बिना कैल्शियम का बड़ा हिस्सा सोखा ही नहीं जाता. यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि हड्डी की मज़बूती और जोड़ की तकलीफ दो अलग चीज़ें हैं, लेकिन जिन लोगों में विटामिन डी बहुत कम होता है उनमें मांसपेशी की कमज़ोरी और फैला हुआ दर्द आम शिकायत है.

हल्दी, अदरक, लहसुन और दालचीनी

ये रोज़ के मसाले हैं और इनका काम धीमा लेकिन असली है. हल्दी को थोड़ी चिकनाई और चुटकी भर काली मिर्च के साथ लेने पर शरीर इसे बेहतर सोखता है. अदरक कई लोगों में सुबह की जकड़न में हल्का आराम देता है. इन्हें नुस्खा मानने के बजाय रोज़ की रसोई का हिस्सा मानना ज़्यादा काम आता है.

पानी

जोड़ की गद्दी और उसके आसपास का तरल, दोनों को पानी चाहिए. दिन भर सादा पानी ठीक मात्रा में पीना सबसे सस्ती और सबसे ज़्यादा टाली जाने वाली आदत है.

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क्या कम करना समझदारी है

मैदा और बहुत ज़्यादा रिफाइंड चीज़ें. ब्रेड, बिस्किट, नमकीन, बेकरी का सामान. ये जल्दी पचकर खून में शक्कर का उछाल लाते हैं और उस धीमी सूजन को बनाए रखने में हिस्सा डालते हैं.

मीठे पेय और पैकेट का जूस. यह उन कुछ चीज़ों में है जिनका संबंध जोड़ों की तकलीफ बढ़ने से बार बार देखा गया है. इनसे मिलने वाली कैलोरी पेट भी नहीं भरती, इसलिए वजन पर असर दोहरा पड़ता है.

बार बार गरम किए गए तेल में तली चीज़ें. समोसा, पकौड़ा, पूरी, बाहर की तली हुई चीज़ें. यहां असली दिक्कत तेल का दोबारा गरम होना और मात्रा है, कभी कभार घर पर बनी तली चीज़ का मतलब यह नहीं कि सब बिगड़ गया.

बहुत ज़्यादा नमक और प्रोसेस्ड मांस. पैकेट का नमकीन, अचार की ज़्यादा मात्रा, और लंबे समय तक टिकने वाला प्रोसेस्ड मांस.

शराब. यह दो तरफ से नुकसान करती है. एक, यह खाली कैलोरी देकर वजन बढ़ाती है. दो, यह यूरिक एसिड बढ़ाने वाली चीज़ों में गिनी जाती है, और जिन लोगों का दर्द उससे जुड़ा है उनमें यह सीधा असर डालती है.

एक बात साफ कर देना ज़रूरी है. दही, टमाटर, बैंगन और आलू जैसी चीज़ों को जोड़ों के दर्द में पूरी तरह बंद कर देने की सलाह बहुत आम है, लेकिन इसके पीछे मज़बूत सबूत नहीं है. इन्हें बिना जांचे हटा देने से थाली कमज़ोर होती है और फायदा उल्टा घट जाता है.

अगर दर्द यूरिक एसिड से जुड़ा है

यह अलग से समझने वाली स्थिति है, क्योंकि इसमें थाली के नियम थोड़े बदल जाते हैं.

पहचान यह है कि दर्द अचानक शुरू होता है, बहुत तेज़ होता है, अक्सर एक ही जोड़ में होता है, और वह जोड़ लाल, गरम और छूने में बहुत दर्द वाला हो जाता है. पैर का अंगूठा सबसे आम जगह है.

ऐसी स्थिति में शराब, ज़्यादा मात्रा में लाल मांस और कुछ खास मछलियां, और मीठे पेय पर ध्यान देना सबसे ज़्यादा मायने रखता है, साथ में पानी की मात्रा बढ़ाना. दालें और सब्ज़ियां पूरी तरह बंद करने की सलाह पुरानी है. इस हिस्से के लिए यूरिक एसिड कैसे कम करें पढ़ना ज़्यादा उपयोगी रहेगा.

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पूरे दिन का डाइट चार्ट

यह एक ढांचा है, पत्थर की लकीर नहीं. मात्रा आपकी भूख, वजन और काम के हिसाब से बदलेगी.

सुबह उठकर: एक गिलास सादा पानी. चाहें तो रात भर भीगी हुई थोड़ी मेथी के दाने.

नाश्ता, दो विकल्प: पहला, दो अंडे या एक कटोरी गाढ़ा दही, साथ में एक या दो मल्टीग्रेन रोटी या पोहा जिसमें मूंगफली और सब्ज़ी डली हो. दूसरा, बेसन या मूंग दाल का चीला दो, अंदर पालक और शिमला मिर्च भरकर, साथ में एक कटोरी दही. दोनों में ऊपर से एक चम्मच पिसी अलसी.

बीच में: मुट्ठी भर भुने चने या पांच छह अखरोट. चाय के साथ बिस्किट की जगह यही रखिए.

दोपहर का खाना: दो रोटी, एक कटोरी गाढ़ी दाल या राजमा या छोले, एक कटोरी हरी सब्ज़ी, एक कटोरी दही, और सलाद. मांसाहारी लोग हफ्ते में दो बार दाल की जगह मछली रख सकते हैं.

शाम: एक कप अदरक वाली चाय बिना ज़्यादा चीनी के, साथ में एक फल. तली हुई चीज़ों की जगह यही तय कीजिए, क्योंकि शाम ही वह समय है जब ज़्यादातर लोगों की थाली बिगड़ती है.

रात का खाना: हल्का लेकिन प्रोटीन वाला. एक रोटी और सब्ज़ी के साथ पनीर या सोया की बड़ी या मूंग दाल. रात को बहुत भारी और बहुत तला खाना सुबह की जकड़न बढ़ा सकता है.

सोने से पहले: एक कप हल्दी वाला दूध, अगर दूध ठीक से पचता हो.

हफ्ते के नियम: हरी पत्तेदार सब्ज़ी कम से कम चार दिन, ओमेगा वाला हिस्सा कम से कम तीन दिन, बाहर का तला हुआ खाना हफ्ते में एक बार से ज़्यादा नहीं.

जो काम नहीं करता

पहला, अकेले खाने के भरोसे बैठ जाना. थाली ठीक हो और शरीर पूरे दिन हिले ही नहीं, तो जोड़ अकड़ते ही हैं. जोड़ों के लिए हलचल दवा जैसी है, बस उसका तरीका सही होना चाहिए. घुटनों की तकलीफ में क्या करें और क्या न करें, यह घुटनों के दर्द का घरेलू उपाय में अलग से समझाया गया है.

दूसरा, एक साथ दस चीज़ें बंद कर देना. दही, टमाटर, चावल, आलू, सब एक हफ्ते में बंद. थाली से पोषण चला जाता है और यह तरीका चलता भी नहीं.

तीसरा, वजन को अलग समस्या मानना. ज़्यादा वजन के साथ जोड़ों का दर्द ठीक करने की कोशिश आधी लड़ाई हाथ बांधकर लड़ने जैसी है.

चौथा, प्रोटीन को नज़रअंदाज़ करना. मांसपेशी कमज़ोर होती जाए तो जोड़ पर भार बढ़ता जाता है, चाहे कितनी भी हल्दी खा लें.

पांचवां, दर्द बढ़ने पर पूरी तरह बिस्तर पकड़ लेना. तेज़ दर्द के दिनों में आराम ज़रूरी है, लेकिन लंबे समय तक बिल्कुल न चलना जकड़न बढ़ाता है.

चार हफ्ते का आसान प्लान

पहला हफ्ता, सिर्फ जोड़िए. कुछ भी बंद मत कीजिए. बस हर मुख्य भोजन में एक प्रोटीन वाला हिस्सा पक्का कीजिए और रोज़ एक चम्मच पिसी अलसी जोड़ दीजिए.

दूसरा हफ्ता, एक चीज़ हटाइए. मीठा पेय या पैकेट का जूस, या शाम की तली हुई चीज़. एक ही, और वही पूरे हफ्ते.

तीसरा हफ्ता, हलचल जोड़िए. रोज़ पंद्रह से बीस मिनट आराम से चलना, और जोड़ के आसपास की मांसपेशी के लिए हल्की एक्सरसाइज़, जो आपके डॉक्टर या फिज़ियो ने बताई हो.

चौथा हफ्ता, थाली को पूरा कीजिए. रोज़ दो रंग की सब्ज़ी, कैल्शियम वाला एक हिस्सा, और पानी की मात्रा तय कीजिए.

नापने का तरीका: तराजू नहीं, तीन चीज़ें लिखिए. सुबह की जकड़न कितने मिनट रही, सीढ़ी चढ़ने पर दस में से कितना दर्द रहा, और दिन के आखिर में जोड़ कितना भारी लगा. चार हफ्ते बाद इन लाइनों को एक साथ पढ़िए. फर्क यहीं दिखेगा, तराजू पर नहीं.

कब डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है

अगर जोड़ अचानक लाल, गरम और बहुत ज़्यादा दर्द वाला हो जाए, अगर बुखार के साथ जोड़ों में सूजन हो, अगर सुबह की जकड़न रोज़ एक घंटे से ज़्यादा रहती हो, अगर कई जोड़ एक साथ और दोनों तरफ प्रभावित हों, अगर जोड़ में से आवाज़ के साथ अटकने या लॉक होने जैसा महसूस हो, अगर बिना कोशिश के वजन घट रहा हो, या अगर दर्द की वजह से चलना फिरना और रोज़ के काम प्रभावित हो रहे हों, तो यह घरेलू बदलावों का दायरा नहीं है.

ऐसी स्थिति में सही जांच से यह पता चलता है कि दर्द के पीछे घिसाव है, यूरिक एसिड है, प्रतिरोधक व्यवस्था से जुड़ी कोई स्थिति है, या कुछ और, और उसी के हिसाब से इलाज तय होता है. खाना उस इलाज के साथ चलता है, उसकी जगह नहीं लेता.

मिलाकर बात यह है

जोड़ों के दर्द में थाली का काम एक चमत्कारी नुस्खा देना नहीं है. उसका काम रोज़ थोड़ा थोड़ा माहौल बदलना है, ताकि सूजन कम रहे, वजन उतरे और मांसपेशी बनी रहे.

अगर आप सिर्फ तीन चीज़ें उठाना चाहते हैं तो ये लीजिए: हर भोजन में प्रोटीन, रोज़ ओमेगा वाला एक हिस्सा और दो रंग की सब्ज़ी, और मीठे पेय व बाहर की तली चीज़ों में साफ कटौती. बाकी सब इसके ऊपर बनता है.

मुश्किल हिस्सा जानकारी नहीं है. मुश्किल हिस्सा यह है कि यह उन हफ्तों में भी चलता रहे जब दर्द ज़्यादा हो और मन कुछ न करने का हो. SuperLiving पर 20+ कोच हिंदी और हिंग्लिश में इसे आपकी थाली और आपकी दिनचर्या के हिसाब से छोटे कदमों में बांटते हैं, ताकि यह एक और लंबी सूची न बनकर रोज़ निभाने लायक तरीका बने.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या सिर्फ खाना बदलने से जोड़ों का दर्द ठीक हो सकता है? अकेले खाने से दर्द पूरी तरह खत्म हो जाएगा, ऐसा कहना गलत होगा. खाना उन तीन चार चीज़ों में से एक है जो फर्क डालती हैं, बाकी हैं वजन, हलचल, नींद और अगर कोई स्थिति है तो उसका इलाज. लेकिन खाने का असर दो तरफ से आता है. पहला, शरीर में लगातार बनी रहने वाली हल्की सूजन को बढ़ाने या घटाने में थाली का सीधा हाथ होता है. दूसरा, वजन का हर किलो घुटनों पर कई किलो का दबाव बनकर पड़ता है. ज़्यादातर लोगों को अकड़न और भारीपन में फर्क महसूस होता है, दर्द की तीव्रता में फर्क धीरे आता है.

क्या दही, टमाटर और खट्टी चीज़ें जोड़ों के दर्द में बंद कर देनी चाहिए? यह भारत में सबसे आम सलाह है और ज़्यादातर लोगों के लिए यह ज़रूरी नहीं है. दही असल में मददगार है क्योंकि यह कैल्शियम और प्रोटीन दोनों देता है. टमाटर, बैंगन, आलू और शिमला मिर्च को लेकर जो डर फैला है, उसके पीछे मज़बूत सबूत नहीं है. हां, कुछ लोगों को लगता है कि कोई खास चीज़ खाने पर तकलीफ बढ़ती है, और ऐसा हो सकता है. सही तरीका यह है कि पूरी श्रेणी बंद करने के बजाय दो हफ्ते तक एक ही चीज़ हटाकर देखें, फिर वापस जोड़कर देखें.

जोड़ों के दर्द में कितना प्रोटीन चाहिए और शाकाहारी लोग कहां से लें? जोड़ का दर्द अक्सर इसलिए भी बढ़ता है क्योंकि आसपास की मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं और जोड़ पर सीधा भार आ जाता है. मोटा नियम यह है कि हर मुख्य भोजन में एक साफ प्रोटीन वाला हिस्सा दिखना चाहिए. शाकाहारी लोगों के लिए दाल, राजमा, छोले, सोयाबीन की बड़ी, पनीर, दही, दूध, मूंगफली और भुने चने अच्छे विकल्प हैं. एक कटोरी पतली दाल को प्रोटीन मान लेना सबसे आम गलती है, दाल गाढ़ी होनी चाहिए.

क्या वजन कम करने से घुटनों का दर्द सच में कम होता है? यह उन गिनी चुनी बातों में से है जिन पर सबसे ज़्यादा भरोसा किया जा सकता है. चलते समय घुटने पर शरीर के वजन का कई गुना दबाव पड़ता है, और सीढ़ी उतरते समय यह और बढ़ जाता है. इसलिए थोड़ा सा वजन घटने पर भी रोज़ का कुल दबाव काफी घट जाता है. यहां जल्दबाज़ी काम नहीं आती, क्योंकि बहुत तेज़ वजन घटाने की कोशिश में प्रोटीन कम पड़ता है और मांसपेशी भी साथ में घट जाती है, जो जोड़ के लिए उल्टा नुकसान है.

हल्दी, अदरक और मेथी वाले घरेलू नुस्खे कितने काम के हैं? ये चीज़ें थाली का हिस्सा बनकर उपयोगी हैं, चमत्कार बनकर नहीं. हल्दी में मौजूद तत्व सूजन के रास्ते पर असर डालते हैं, लेकिन खाने में डाली गई मात्रा कम होती है और शरीर उसे आसानी से सोखता भी नहीं, इसलिए इसे काली मिर्च और थोड़ी चिकनाई के साथ लेना बेहतर माना जाता है. अदरक कई लोगों में सुबह की जकड़न में हल्का आराम देता है. इन्हें दवा का विकल्प मानना ठीक नहीं है, और सप्लीमेंट के रूप में ज़्यादा मात्रा लेने से पहले डॉक्टर से बात करनी चाहिए.

फर्क महसूस होने में कितना समय लगता है? सूजन से जुड़ी तकलीफ में फर्क आमतौर पर चार से आठ हफ्तों में महसूस होता है, अगर बदलाव लगातार निभाया जाए. सबसे पहले जो चीज़ बदलती है वह दर्द की तीव्रता नहीं, बल्कि सुबह की अकड़न का समय होता है. उसके बाद सीढ़ी चढ़ने उतरने में आसानी. अगर आठ हफ्ते ठीक से निभाने के बाद भी कोई फर्क नहीं दिखता, या दर्द बढ़ रहा है, तो जांच ज़रूरी है, क्योंकि जोड़ों के दर्द के पीछे यूरिक एसिड, थायराइड या विटामिन डी की कमी जैसी वजहें भी हो सकती हैं.

SuperLiving जीवनशैली और वेलनेस सहायता देता है और यह चिकित्सकीय सलाह, निदान या इलाज का विकल्प नहीं है. जोड़ों में अचानक तेज़ दर्द, लालिमा और गर्माहट, बुखार के साथ सूजन, एक घंटे से ज़्यादा रहने वाली सुबह की जकड़न, या चलने फिरने में बाधा जैसी स्थिति में कृपया योग्य डॉक्टर से सलाह लें. कोई भी सप्लीमेंट या इलाज अपने मन से शुरू या बंद न करें, खास तौर पर अगर कोई इलाज पहले से चल रहा हो, या गर्भावस्था, गुर्दे और लिवर से जुड़ी कोई स्थिति हो.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या सिर्फ खाना बदलने से जोड़ों का दर्द ठीक हो सकता है?+

अकेले खाने से दर्द पूरी तरह खत्म हो जाएगा, ऐसा कहना गलत होगा. खाना उन तीन चार चीज़ों में से एक है जो फर्क डालती हैं, बाकी हैं वजन, हलचल, नींद और अगर कोई स्थिति है तो उसका इलाज. लेकिन खाने का असर दो तरफ से आता है. पहला, शरीर में लगातार बनी रहने वाली हल्की सूजन को बढ़ाने या घटाने में थाली का सीधा हाथ होता है. दूसरा, वजन का हर किलो घुटनों पर कई किलो का दबाव बनकर पड़ता है, और वजन का रास्ता थाली से ही जाता है. व्यावहारिक बात यह है कि खाना बदलने से ज़्यादातर लोगों को अकड़न और भारीपन में फर्क महसूस होता है, दर्द की तीव्रता में फर्क धीरे आता है, और अगर जोड़ में कोई ढांचागत नुकसान है तो उसे खाना ठीक नहीं करेगा.

क्या दही, टमाटर और खट्टी चीज़ें जोड़ों के दर्द में बंद कर देनी चाहिए?+

यह भारत में सबसे आम सलाह है और ज़्यादातर लोगों के लिए यह ज़रूरी नहीं है. दही असल में मददगार है क्योंकि यह कैल्शियम और प्रोटीन दोनों देता है और पेट के लिए अच्छा है. टमाटर, बैंगन, आलू और शिमला मिर्च वाली सब्ज़ियों को लेकर जो डर फैला है, उसके पीछे मज़बूत सबूत नहीं है, और ये सब्ज़ियां विटामिन और फाइबर देती हैं. हां, कुछ लोगों को अपने अनुभव से लगता है कि कोई खास चीज़ खाने पर उनकी तकलीफ बढ़ती है, और ऐसा हो सकता है क्योंकि हर शरीर एक जैसा नहीं होता. सही तरीका यह है कि पूरी श्रेणी बंद करने के बजाय दो हफ्ते तक एक ही चीज़ हटाकर देखें, फिर वापस जोड़कर देखें. बिना जांचे कई चीज़ें एक साथ बंद कर देने से थाली कमज़ोर हो जाती है और फायदा उल्टा घट जाता है.

जोड़ों के दर्द में कितना प्रोटीन चाहिए और शाकाहारी लोग कहां से लें?+

जोड़ का दर्द अक्सर इसलिए भी बढ़ता है क्योंकि आसपास की मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं और जोड़ पर सीधा भार आ जाता है. मांसपेशी बनाने और बचाने के लिए प्रोटीन चाहिए, और भारतीय थाली में यही हिस्सा सबसे ज़्यादा छूटता है. मोटा नियम यह है कि हर मुख्य भोजन में एक साफ प्रोटीन वाला हिस्सा दिखना चाहिए. शाकाहारी लोगों के लिए दाल, राजमा, छोले, सोयाबीन की बड़ी, पनीर, दही, दूध, मूंगफली और भुने चने अच्छे विकल्प हैं. एक कटोरी पतली दाल को प्रोटीन मान लेना सबसे आम गलती है, दाल गाढ़ी होनी चाहिए. अंडा और मछली खाने वाले लोगों के लिए यह हिस्सा और आसान हो जाता है, खास तौर पर मछली, क्योंकि उसमें मौजूद चिकनाई सूजन के मामले में मददगार मानी जाती है.

क्या वजन कम करने से घुटनों का दर्द सच में कम होता है?+

यह उन गिनी चुनी बातों में से है जिन पर सबसे ज़्यादा भरोसा किया जा सकता है. चलते समय घुटने पर शरीर के वजन का कई गुना दबाव पड़ता है, और सीढ़ी उतरते समय यह और बढ़ जाता है. इसका मतलब है कि थोड़ा सा वजन घटने पर भी घुटने पर पड़ने वाला रोज़ का कुल दबाव काफी घट जाता है. यही वजह है कि जोड़ों के दर्द से जूझ रहे ज़्यादा वजन वाले लोगों में सबसे बड़ा और सबसे भरोसेमंद फर्क वजन कम होने पर दिखता है. यहां जल्दबाज़ी काम नहीं आती, क्योंकि बहुत तेज़ वजन घटाने की कोशिश में प्रोटीन कम पड़ता है और मांसपेशी भी साथ में घट जाती है, जो जोड़ के लिए उल्टा नुकसान है. धीमी रफ्तार, ठीक प्रोटीन और रोज़ की हलचल, यही तीनों साथ चलने चाहिए.

हल्दी, अदरक और मेथी वाले घरेलू नुस्खे कितने काम के हैं?+

ये चीज़ें थाली का हिस्सा बनकर उपयोगी हैं, चमत्कार बनकर नहीं. हल्दी में मौजूद तत्व सूजन के रास्ते पर असर डालते हैं, लेकिन खाने में डाली गई हल्दी की मात्रा बहुत कम होती है और शरीर उसे आसानी से सोखता भी नहीं, इसलिए इसे काली मिर्च और थोड़ी चिकनाई के साथ लेना बेहतर माना जाता है. अदरक कई लोगों में अकड़न और सुबह की जकड़न में हल्का आराम देता है. मेथी के दाने पानी में भिगोकर लेना पुरानी आदत है और यह पाचन के लिहाज़ से ठीक है. इनका असली फायदा तब दिखता है जब बाकी थाली भी ठीक हो, वजन काबू में हो और हलचल बनी रहे. इन्हें दवा का विकल्प मानना ठीक नहीं है, और किसी भी सप्लीमेंट के रूप में इन्हें ज़्यादा मात्रा में लेने से पहले डॉक्टर से बात करनी चाहिए, खास तौर पर अगर खून पतला करने वाला या कोई और इलाज पहले से चल रहा हो.

फर्क महसूस होने में कितना समय लगता है?+

ईमानदार जवाब यह है कि सूजन से जुड़ी तकलीफ में फर्क आमतौर पर चार से आठ हफ्तों में महसूस होता है, अगर बदलाव लगातार निभाया जाए. सबसे पहले जो चीज़ बदलती है वह दर्द की तीव्रता नहीं होती, बल्कि सुबह की अकड़न का समय होता है. जिन लोगों को उठने के बाद बीस पच्चीस मिनट तक जकड़न रहती थी, उन्हें पहले वह घटती हुई महसूस होती है. उसके बाद सीढ़ी चढ़ने उतरने में आसानी और दिन के आखिर में जोड़ का कम सूजा हुआ लगना. अगर आठ हफ्ते ठीक से निभाने के बाद भी कोई फर्क नहीं दिखता, या दर्द बढ़ रहा है, तो यह मान लेना कि खाना ही अकेली वजह थी सही नहीं है. उस स्थिति में जांच ज़रूरी है, क्योंकि जोड़ों के दर्द के पीछे यूरिक एसिड, थायराइड, विटामिन डी की कमी या कोई ऐसी स्थिति भी हो सकती है जिसका इलाज अलग होता है.

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