वजन कम करने के लिए खाने और एक्सरसाइज़ का सबसे अच्छा समय क्या है
छोटा जवाब
अगर आप गूगल पर यह सवाल ढूंढ रहे हैं कि खाना कब खाएं और एक्सरसाइज़ कब करें ताकि वजन सबसे तेज़ घटे, तो सीधा जवाब थोड़ा निराश करने वाला लग सकता है. कोई एक जादुई घड़ी नहीं है जो सबके लिए काम करे.
जो असल में काम करता है वह यह है कि आप अपनी नींद के समय से पीछे गिनकर एक रूटीन बना लें, और उसे हफ्ते के ज़्यादातर दिन एक जैसा रखें. नाश्ता उठने के एक से दो घंटे के अंदर, रात का खाना सोने से दो से तीन घंटे पहले, और एक्सरसाइज़ वह समय जो आपका दिन सबसे कम बार कैंसिल करता है, चाहे वह सुबह हो या शाम. यही तीन चीज़ें मिलकर असली फर्क डालती हैं, घड़ी का कांटा 7 बजे पर हो या 9 बजे पर, इससे कहीं ज़्यादा.
इस आर्टिकल में हम खाने और एक्सरसाइज़ दोनों के टाइमिंग को एक साथ जोड़कर देखेंगे, क्योंकि असल ज़िंदगी में ये दोनों अलग अलग नहीं चलते, एक का असर दूसरे पर सीधा पड़ता है.
टाइमिंग मायने रखती है, पर कैलोरी और नींद से ज़्यादा नहीं
यह समझना ज़रूरी है कि टाइमिंग वजन घटाने की लिस्ट में कहां आती है. सबसे ऊपर है कि आप दिन भर में कितना खा रहे हैं और कितनी हलचल कर रहे हैं. उसके बाद आती है नींद, क्योंकि कम या टूटी हुई नींद भूख के हार्मोन को गड़बड़ कर देती है. टाइमिंग इन दोनों के नीचे आती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह बेकार है.
टाइमिंग का असली काम है इन दो बड़ी चीज़ों को आसान बनाना. जब खाना और हलचल रोज़ लगभग एक जैसी घड़ी पर होती है, तो भूख पहले से अंदाज़ा लगाकर आती है, मन लगातार खाने के बारे में नहीं सोचता, और एक्सरसाइज़ को याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती, वह अपने आप दिन का हिस्सा बन जाती है. इसीलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन सा समय सबसे तेज़ वजन घटाता है, सवाल यह होना चाहिए कि कौन सा समय आप अगले तीन महीने लगातार निभा सकते हैं.
शोध में जब कुल कैलोरी और कुल हलचल बराबर रखी जाती है, तो सुबह खाने वालों और रात में खाने वालों के बीच, या सुबह एक्सरसाइज़ करने वालों और शाम को करने वालों के बीच, वजन घटने की रफ्तार में बहुत छोटा फर्क मिलता है. फर्क तब बड़ा होता है जब टाइमिंग की वजह से किसी की नींद खराब होती है, या कोई शेड्यूल इतना मुश्किल होता है कि वह दो हफ्ते में ही छूट जाता है.
सुबह का हिस्सा, नाश्ता और सुबह की हलचल का तालमेल
सुबह का रूटीन बाकी दिन की दिशा तय कर देता है, इसलिए यहां से शुरू करना ठीक रहता है.
उठने के बाद पहले एक से दो घंटे में कुछ खाएं. बहुत देर तक भूखा रहने से दोपहर तक चिड़चिड़ापन और अचानक तेज़ भूख लगने लगती है, जिसमें लोग अक्सर जल्दी वाले मीठे या तले हुए ऑप्शन चुन लेते हैं. प्रोटीन और फाइबर वाला नाश्ता, जैसे मूंग दाल चीला या दही के साथ फल, इस भूख को काबू में रखता है. नाश्ते में क्या खाना फायदेमंद है, इस पर हमारी अलग गाइड वजन घटाने के लिए नाश्ता पूरी जानकारी देती है.
अगर सुबह एक्सरसाइज़ करते हैं, तो खाली पेट करना ठीक है. हल्की वॉक, योगा या आसान होम वर्कआउट के लिए ज़्यादातर लोगों को पहले कुछ खाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. अगर कमज़ोरी या चक्कर जैसा महसूस हो, तो एक केला या मुट्ठी भर भीगे बादाम बीस से तीस मिनट पहले ले लें. भारी वेट ट्रेनिंग या तेज़ इंटरवल सेशन से पहले थोड़ा ज़्यादा फ्यूल चाहिए हो सकता है.
सुबह एक्सरसाइज़ के फायदे और नुकसान खुद अलग से समझने लायक हैं. सुबह का सबसे बड़ा फायदा यह है कि दिन अभी शुरू नहीं हुआ होता, इसलिए मीटिंग, ट्रैफिक या घर का कोई काम बीच में आकर सेशन कैंसिल नहीं करता. सुबह और शाम की एक्सरसाइज़ के बीच पूरा फर्क समझने के लिए सुबह या शाम की एक्सरसाइज़, कौन सी बेहतर है पढ़ना उपयोगी रहेगा, क्योंकि वहां दोनों तरफ की असली परेशानियों पर विस्तार से बात की गई है.
नाश्ते के बाद वर्कआउट करने वालों के लिए, सेशन शुरू करने से कम से कम एक घंटा खाने के बाद का गैप रखें, ताकि पेट भरा होने की वजह से बेचैनी न हो.
दिन के बीच का हिस्सा, लंच और एनर्जी का ढलना
दोपहर का खाना अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है, लेकिन यही वह समय है जो बाकी दिन की भूख तय करता है.
लंच बहुत देर तक टालने से शाम तक इतनी तेज़ भूख लग जाती है कि शाम की हलचल या एक्सरसाइज़ का मन ही नहीं करता, शरीर सिर्फ खाना चाहता है. दूसरी तरफ लंच में बहुत ज़्यादा भारी और तला हुआ खाना दोपहर के बाद नींद और सुस्ती ला देता है, जिससे शाम की एक्सरसाइज़ टलने लगती है.
एक आसान तरीका यह है कि लंच में दाल, सब्जी और थोड़ी रोटी या चावल का संतुलन रखें, और प्लेट का आधा हिस्सा सब्जी से भरें. इससे दोपहर के बाद नींद कम आती है और शाम की एक्सरसाइज़ के लिए एनर्जी बची रहती है. अगर दोपहर के बाद भारी सुस्ती और थकान एक रोज़ की समस्या बन गई है, तो यह हमेशा सिर्फ खाने की वजह से नहीं होती, कई बार नींद या तनाव भी इसमें शामिल रहते हैं.
यहां एक छोटा और आसान नियम काम करता है, जिस दिन लंच हल्का और संतुलित रहता है, शाम की हलचल करने का मन खुद बनता है, जिस दिन लंच बहुत भारी रहता है, शाम पूरी तरह आराम में निकल जाती है.
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