रात को पैरों में अकड़न और ऐंठन के कारण: राहत, बचाव और जांच की पूरी बात
छोटा जवाब
अगर रात में सोते समय अचानक पिंडली या पंजे की मांसपेशी पत्थर जैसी सख्त हो जाती है और तेज़ दर्द के साथ नींद टूट जाती है, तो यह आमतौर पर रात की मांसपेशियों की ऐंठन है, न कि कोई गंभीर बीमारी. ज़्यादातर मामलों में इसके पीछे पानी की कमी, लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहना, दिन भर की ज़्यादा मेहनत, या मैग्नीशियम-कैल्शियम-पोटैशियम जैसे तत्वों की कमी होती है.
राहत का सबसे सीधा तरीका है मांसपेशी को तुरंत खींचना और हल्की मालिश करना. बचाव के लिए सोने से पहले हल्की स्ट्रेचिंग, दिन भर पर्याप्त पानी, और थाली में सही पोषक तत्व जोड़ना काफी हद तक मदद करता है. अगर ऐंठन बहुत बार आने लगे या सामान्य उपायों से राहत न मिले, तो डॉक्टर से जांच करवाना सही कदम है.
रात में पैरों की ऐंठन के पीछे क्या वजहें होती हैं
रात की पैरों की ऐंठन अचानक, बिना चेतावनी के आती है, लेकिन इसके पीछे आमतौर पर कई छोटी वजहें मिलकर काम करती हैं.
पानी की कमी. दिन भर कम पानी पीना शरीर के इलेक्ट्रोलाइट संतुलन को बिगाड़ता है, और यही संतुलन मांसपेशियों के सही तरीके से सिकुड़ने-ढीले होने के लिए ज़रूरी है.
दिन भर ज़्यादा मेहनत या एक्सरसाइज़. सामान्य से ज़्यादा चलना, खड़े रहना या वर्कआउट करना मांसपेशियों को थका देता है, और थकी हुई मांसपेशी रात में ज़्यादा आसानी से अकड़ जाती है.
लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठना या खड़े रहना. दफ्तर में घंटों एक ही कुर्सी पर बैठे रहना या दुकान में खड़े रहकर काम करना, दोनों पिंडली की मांसपेशियों पर दबाव बढ़ाते हैं.
मैग्नीशियम, कैल्शियम और पोटैशियम की कमी. ये तीनों तत्व मांसपेशियों के सिकुड़ने और ढीले होने की पूरी प्रक्रिया में शामिल हैं. इनकी कमी होने पर मांसपेशी ठीक से आराम नहीं कर पाती. मैग्नीशियम की कमी के पूरे लक्षण और उपाय अलग से समझने के लिए मैग्नीशियम की कमी के लक्षण पढ़ना उपयोगी रहेगा, क्योंकि वहां इसी तरह की रात की ऐंठन को विस्तार से समझाया गया है.
उम्र बढ़ना. उम्र के साथ मांसपेशियों और टेंडन की प्राकृतिक लचक कम होती जाती है, जिससे रात की ऐंठन की समस्या ज़्यादा आम हो जाती है, खास तौर पर पैंतालीस साल के बाद.
गर्भावस्था. गर्भावस्था के दौरान शरीर का वज़न और रक्त संचार दोनों बदलते हैं, जिससे कई महिलाओं को खास तौर पर दूसरी और तीसरी तिमाही में रात की पैरों की ऐंठन का सामना करना पड़ता है.
कुछ दवाएं. कुछ दवाओं का साइड इफेक्ट भी मांसपेशियों की ऐंठन बढ़ा सकता है. अगर कोई नई दवा शुरू करने के बाद यह समस्या बढ़ी है, तो डॉक्टर से इस बारे में बात करना सही रहता है.
रेस्टलेस लेग सिंड्रोम से यह कैसे अलग है
यह हिस्सा समझना सबसे ज़रूरी है, क्योंकि दोनों समस्याएं रात में आती हैं और अक्सर एक दूसरे के साथ गड़बड़ा दी जाती हैं, जबकि इनका इलाज और वजह बिल्कुल अलग है.
रात की मांसपेशी ऐंठन में मांसपेशी अचानक कसकर सख्त हो जाती है, जैसे उसमें गांठ बन गई हो. साथ में तेज़, साफ महसूस होने वाला दर्द होता है. इसे खींचने या मसलने पर कुछ ही मिनट में राहत मिल जाती है, और दर्द आमतौर पर एक ही जगह, अक्सर पिंडली में होता है.
रेस्टलेस लेग सिंड्रोम बिल्कुल अलग तरह से काम करता है. इसमें मांसपेशी सख्त नहीं होती और तेज़ दर्द भी नहीं होता, बल्कि पैर के अंदर रेंगने, खिंचाव या बेचैनी जैसी एक अजीब सी सनसनी होती है, जिसके साथ पैर को लगातार हिलाते रहने की तेज़ इच्छा बनी रहती है. यह आराम करने पर, यानी बैठे या लेटे रहने पर बढ़ती है, और चलने-फिरने से कुछ देर के लिए कम हो जाती है, फिर वापस आ जाती है. इसके पीछे की वजह मांसपेशी की थकान नहीं बल्कि दिमाग़ में नर्व सिग्नल के काम करने का तरीका होता है, और अक्सर दिमाग़ में आयरन की कमी से जुड़ी होती है. इसकी पूरी पहचान और वजहें रेस्टलेस लेग सिंड्रोम के कारण और उपाय में विस्तार से बताई गई हैं.
सीधा फर्क याद रखने का तरीका यह है: अगर मांसपेशी सख्त होकर दर्द देती है और खींचने से तुरंत राहत मिलती है, तो यह ऐंठन है. अगर कोई साफ दर्द नहीं बल्कि सिर्फ हिलाते रहने की बेचैन इच्छा है, तो वह रेस्टलेस लेग सिंड्रोम के करीब है. दोनों के इलाज और डॉक्टर को दिखाने की ज़रूरत भी अलग अलग है, इसलिए सही पहचान पहला कदम है.
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किन लोगों में खतरा सबसे ज़्यादा है
कुछ लोगों में रात की पैरों की ऐंठन ज़्यादा आम होती है, और इनमें से किसी में आना अपने आप में चिंता की बात नहीं, बस ध्यान देने लायक संकेत है.
पैंतालीस साल से ज़्यादा उम्र के लोग, जिनकी मांसपेशियों की लचक स्वाभाविक रूप से कम हो चुकी होती है. गर्भवती महिलाएं, खास तौर पर दूसरी और तीसरी तिमाही में. दिन भर खड़े रहकर काम करने वाले लोग, जैसे दुकानदार, शिक्षक या फैक्ट्री में काम करने वाले. नियमित रूप से तेज़ एक्सरसाइज़ करने वाले एथलीट और जिम जाने वाले लोग. डायबिटीज़ या थायराइड जैसी स्थिति वाले लोग. और वे लोग जो बहुत कम पानी पीते हैं या गर्मी में ज़्यादा पसीना बहाते हैं.
अगर आप इनमें से किसी समूह में आते हैं और हफ्ते में दो तीन बार से ज़्यादा ऐंठन आती है, तो नीचे बताए बचाव के उपाय शुरू करना और ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टर से बात करना समझदारी है.
ऐंठन आने पर तुरंत राहत कैसे पाएं
जब ऐंठन आए, तो घबराने के बजाय इन कदमों को आज़माइए.
मांसपेशी को धीरे धीरे खींचिए. पिंडली में ऐंठन हो तो पैर को सीधा करके पंजे को अपनी तरफ खींचिए, जैसे पंजे से छत को धक्का दे रहे हों. यह सबसे तेज़ और सबसे भरोसेमंद तरीका है.
हल्के हाथ से मालिश कीजिए. मांसपेशी को ऊपर से नीचे की तरफ धीरे धीरे मसलने से सिकुड़न ढीली होती है.
हल्की गर्माहट दीजिए. गर्म पानी की थैली या गुनगुने पानी से सिकाई करने से मांसपेशी को आराम मिलता है.
खड़े होकर थोड़ा चलिए. अगर दर्द सहन करने लायक है तो कुछ कदम चलना मांसपेशी को खिंचने और ढीला होने में मदद करता है.
ज़बरदस्ती न करें. मांसपेशी को और ज़्यादा दबाने, अचानक झटके से हिलाने या बहुत ज़ोर से खींचने से बचें, इससे दर्द बढ़ सकता है और मांसपेशी में खिंचाव आ सकता है.