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नींद और वजन का संबंध: कम सोने से वजन क्यों बढ़ता है

SuperLiving Expert Team·

नींद और वजन का संबंध: कम सोने से वजन क्यों बढ़ता है

छोटा जवाब

कम नींद खुद से चर्बी नहीं बनाती, लेकिन यह शरीर के भीतर चार ऐसे बदलाव कर देती है जिनके बाद वजन बढ़ना लगभग तय हो जाता है। पहला, भूख बढ़ाने वाला हार्मोन ऊपर चला जाता है और पेट भरने का संकेत देने वाला हार्मोन नीचे आ जाता है, इसलिए उतना ही खाना खाकर भी संतुष्टि नहीं मिलती। दूसरा, तनाव वाला हार्मोन कोर्टिसोल दिन भर ऊंचा बना रहता है, जो पेट के आसपास चर्बी जमा होने से जुड़ा है। तीसरा, शरीर की इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता कुछ ही खराब रातों में घट जाती है, यानी वही रोटी और चावल पहले से ज़्यादा असर डालते हैं। चौथा, थकान की वजह से दिन भर की सामान्य हलचल अपने आप घट जाती है और दिमाग तुरंत ऊर्जा देने वाली मीठी और तली हुई चीज़ों की तरफ खिंचता है।

सात से आठ घंटे की नींद इन चारों को उलटी दिशा में मोड़ देती है। इसीलिए नींद को डाइट और एक्सरसाइज़ के बराबर का तीसरा खंभा माना जाता है, और यह वही खंभा है जिस पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है।

ज़रूरी सूचना: यह लेख सामान्य जानकारी और जीवनशैली से जुड़े सुझावों के लिए है और किसी भी तरह से चिकित्सकीय सलाह, निदान या इलाज का विकल्प नहीं है। लंबे समय से चली आ रही अनिद्रा, तेज़ खर्राटे, नींद में सांस रुकने जैसा महसूस होना, या बिना वजह तेज़ी से वजन बढ़ना, इनके पीछे थायराइड, स्लीप एप्निया, हार्मोन से जुड़ी स्थितियां या कोई और स्वास्थ्य समस्या हो सकती है जिसकी जांच ज़रूरी है। कृपया ऐसी स्थिति में योग्य डॉक्टर से सलाह लें। नींद के लिए कोई भी दवा या सप्लीमेंट अपने मन से शुरू न करें।

नींद कम होने पर शरीर के अंदर असल में क्या होता है

लोग मान लेते हैं कि कम सोने का नुकसान सिर्फ थकान है। असल में शरीर कम नींद को एक आपात स्थिति की तरह पढ़ता है, और उस स्थिति में उसका बर्ताव बदल जाता है। नीचे वे बदलाव हैं जो वजन पर सीधा असर डालते हैं।

भूख के दो हार्मोन उलट जाते हैं

भूख और पेट भरने का संकेत दो हार्मोन के तालमेल से बनता है। एक भूख बढ़ाता है और दूसरा दिमाग को बताता है कि अब बस, काफी हो गया। नींद कम होने पर पहला बढ़ जाता है और दूसरा घट जाता है। नतीजा यह होता है कि आपकी थाली वही रहती है, आपकी भूख बढ़ जाती है, और खाना खत्म करने के बाद भी कुछ और खाने का मन बना रहता है।

यही वह जगह है जहां ज़्यादातर लोग खुद को कमज़ोर इच्छाशक्ति वाला समझ बैठते हैं। सच यह है कि आप एक बदले हुए हार्मोन के माहौल में फैसले ले रहे हैं। पांच घंटे सोने के बाद मीठा मना करना और आठ घंटे सोने के बाद मीठा मना करना, ये दो अलग मुश्किलें हैं।

कोर्टिसोल और पेट के आसपास की चर्बी

नींद पूरी न होने पर शरीर तनाव वाले हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर ऊंचा रखता है। कोर्टिसोल का काम शरीर को सतर्क रखना है, लेकिन लगातार ऊंचा रहने पर यह दो चीज़ें करता है: भूख बढ़ाता है और चर्बी को पेट के आसपास जमा करने की तरफ धकेलता है। यही वजह है कि लंबे समय से कम सोने वाले लोगों में वजन का बढ़ना खासकर कमर के घेरे में दिखता है। कमर के आसपास की चर्बी घटाने के बाकी तरीके पेट की चर्बी कम कैसे करें में विस्तार से हैं, लेकिन उनमें से कोई भी नींद ठीक किए बिना अपनी पूरी ताकत से काम नहीं करता।

इंसुलिन का काम मुश्किल हो जाता है

कुछ ही रातों की कम नींद के बाद शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के संकेत पर पहले जितनी तेज़ी से प्रतिक्रिया नहीं देतीं। सीधे शब्दों में, वही खाना खाने पर खून में शुगर पहले से ज़्यादा और ज़्यादा देर तक ऊंची रहती है, और शरीर को उसे संभालने के लिए ज़्यादा इंसुलिन बनाना पड़ता है। ऊंचा इंसुलिन चर्बी जमा करने की तरफ झुका होता है और जमा चर्बी को इस्तेमाल करने में अड़चन डालता है।

अच्छी खबर यह है कि यह बदलाव पलटने वाला है। कुछ रातों की पूरी नींद के बाद यही संवेदनशीलता सुधरने लगती है। बुरी खबर यह है कि हफ्ते भर पांच घंटे सोकर रविवार को दस घंटे सो लेने से हिसाब बराबर नहीं होता।

दिमाग का इनाम वाला हिस्सा तेज़ और रोकने वाला हिस्सा सुस्त

कम नींद के बाद दिमाग का वह हिस्सा जो ज़्यादा कैलोरी वाले खाने को देखकर उत्साहित होता है, ज़्यादा सक्रिय हो जाता है। और वह हिस्सा जो रुककर सोचता है और खुद को रोकता है, सुस्त पड़ जाता है। इसका सीधा नतीजा रसोई में दिखता है। थका हुआ दिमाग समोसा, बिस्किट, चाय और बचा हुआ मीठा चुनता है, दाल चावल सब्ज़ी नहीं। मीठे की तलब को संभालने के व्यावहारिक तरीके how to stop sugar cravings में दिए हैं, और उनमें पहला ही कदम नींद है।

जागने के ज़्यादा घंटे, खाने के ज़्यादा मौके

यह सबसे सीधी बात है और सबसे ज़्यादा नज़रअंदाज़ की जाती है। अगर आप रात एक बजे सोते हैं, तो ग्यारह बजे सोने वाले व्यक्ति के मुकाबले आपके पास खाने के दो अतिरिक्त घंटे हैं, और वे दो घंटे दिन के सबसे कमज़ोर फैसलों वाले घंटे हैं। देर रात कोई सलाद नहीं खाता। रात के इन घंटों में जुड़ने वाली कैलोरी अक्सर तीन सौ से छह सौ के बीच होती है, और यह अकेली आदत महीने भर की मेहनत बराबर कर सकती है।

थकान से दिन भर की हलचल चुपचाप घट जाती है

एक्सरसाइज़ के अलावा भी हम दिन भर कैलोरी खर्च करते हैं: चलना, खड़े रहना, सीढ़ियां, घर का काम, बात करते हुए हिलना डुलना। थकान इस पूरे हिस्से को चुपचाप कम कर देती है। लिफ्ट चुनना, ऑटो लेना, शाम की सैर टाल देना, ये फैसले सचेत नहीं होते, ये थकान के होते हैं। यही वजह है कि जिम की एक घंटे की मेहनत के बाद भी कुल खर्च कम रह जाता है। मेटाबोलिज़्म को असल में क्या बढ़ाता है, इस पर how to boost metabolism में पूरा हिसाब है।

डाइट पर हों तो नुकसान दोगुना

यह हिस्सा सबसे ज़रूरी है। जब कोई कैलोरी कम करके वजन घटाता है, तो शरीर चर्बी और मांसपेशी दोनों में से कुछ न कुछ खोता है। नींद कम होने पर यह अनुपात बिगड़ जाता है और मांसपेशी का नुकसान बढ़ जाता है। मांसपेशी घटने का मतलब है आराम की हालत में जलने वाली कैलोरी घटना, यानी अगली बार वजन घटाना पहले से मुश्किल। इसलिए डाइट के दौरान कम सोना दोगुना घाटा है: आज भूख बढ़ती है और कल का मेटाबोलिज़्म कमज़ोर होता है।

कितनी नींद चाहिए, और कैसे पता चले कि पूरी हो रही है

बड़ी उम्र के लोगों के लिए आमतौर पर सात से नौ घंटे की सलाह दी जाती है। लेकिन घंटे गिनने से ज़्यादा भरोसेमंद चार संकेत हैं।

पहला, सुबह अलार्म बजने से पहले या उसके आसपास अपने आप आंख खुलना, बार बार स्नूज़ दबाए बिना। दूसरा, दिन के पहले आधे हिस्से में झपकी न आना, खासकर दोपहर के खाने के बाद बेकाबू नींद न आना। तीसरा, शाम को चाय, कॉफी या मीठे की तेज़ तलब न लगना। चौथा, छुट्टी वाले दिन आपकी नींद रोज़ से दो घंटे से ज़्यादा लंबी न होना, क्योंकि लंबी छुट्टी वाली नींद इशारा है कि हफ्ते भर कमी जमा हो रही थी।

इनमें से दो या ज़्यादा संकेत बिगड़े हुए हों तो आपके पास नींद की एक असली कमी है, चाहे आप खुद को इसकी आदत लगने की बात कहते हों। आदत लगने का मतलब सिर्फ यह होता है कि थकान महसूस होना बंद हो गया, नुकसान होना बंद नहीं हुआ।

बदलाव जानकारी से नहीं, रोज़ निभाने से आता है। SuperLiving पर 20+ कोच हिंदी और हिंग्लिश में आपकी दिनचर्या, आपकी शिफ्ट और आपके खाने के हिसाब से छोटे छोटे कदम तय करते हैं, सोने का समय और शाम की तलब जैसी चीज़ों को ट्रैक करना आसान रखते हैं, और उन दिनों साथ रहते हैं जब रूटीन टूटने लगता है। SuperLiving डाउनलोड करें

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नींद सुधारने के सात कदम, असर के क्रम में

1. उठने का समय पक्का कीजिए, सोने का नहीं

ज़्यादातर लोग सोने का समय तय करने की कोशिश करते हैं और नाकाम होते हैं, क्योंकि नींद आना आपके बस में नहीं है। उठना आपके बस में है। रोज़ एक ही समय पर उठिए, छुट्टी के दिन भी, और आधे घंटे से ज़्यादा का फर्क मत रखिए। कुछ दिनों में शरीर खुद सोने का समय आगे खींच लेता है, क्योंकि नींद का दबाव तय समय पर बनने लगता है।

2. सुबह की धूप और रात की रोशनी

शरीर की घड़ी रोशनी से चलती है। उठने के एक घंटे के भीतर दस से पंद्रह मिनट खुली धूप या तेज़ प्राकृतिक रोशनी में बिताइए, बालकनी, छत या पैदल चलते हुए। यह अकेला कदम रात की नींद का समय आगे खींचने में सबसे असरदार माना जाता है। इसका उलटा भी सच है, रात में तेज़ रोशनी और स्क्रीन शरीर को यह संकेत देती है कि दिन अभी बाकी है। सोने से एक घंटा पहले घर की रोशनी मद्धम कर दीजिए।

3. कैफीन की एक साफ समय-सीमा

कैफीन शरीर में कई घंटे टिकता है, इसलिए शाम की चाय या कॉफी अक्सर उस नींद को हल्का कर देती है जो आपको लगती है कि आ गई थी। एक सीधा नियम यह है कि दोपहर दो या तीन बजे के बाद चाय, कॉफी और एनर्जी ड्रिंक बंद। जिन लोगों को लगता है कि कैफीन उन पर असर नहीं करता, उन पर भी अक्सर असर होता है, बस नींद आने में नहीं बल्कि नींद की गहराई में।

4. रात का खाना और शराब

रात का खाना सोने से दो से तीन घंटे पहले खत्म कर लीजिए, और उसे भारी और बहुत तला हुआ मत रखिए, वरना सीने में जलन और बेचैनी नींद तोड़ती है। शराब को नींद लाने वाली चीज़ समझना सबसे आम गलतफहमी है। शराब से नींद जल्दी आती है और रात के दूसरे हिस्से में टूट जाती है, गहरी नींद घट जाती है, और सुबह थकान बची रहती है। अगर शराब छोड़ने या घटाने पर काम करना है तो शराब कैसे छोड़ें में इसके व्यावहारिक कदम दिए हैं।

5. कमरा ठंडा, अंधेरा और शांत

नींद आने के लिए शरीर का तापमान थोड़ा गिरना पड़ता है, इसलिए गरम कमरा नींद का दुश्मन है। पंखा या एसी थोड़ा ठंडा रखिए, हल्की चादर लीजिए। पर्दे मोटे रखिए या आंखों पर पट्टी लगाइए, और शोर वाली जगह हो तो एक जैसी हल्की आवाज़, जैसे पंखे की, मददगार होती है। सोने से एक घंटा पहले गुनगुने पानी से नहाना भी काम करता है, क्योंकि उसके बाद शरीर का तापमान गिरता है।

6. सोने से पहले दिमाग का शोर उतारिए

बहुत लोगों को नींद न आने की वजह शरीर नहीं, चलता हुआ दिमाग होता है। सोने से पहले पांच मिनट में कल के तीन काम कागज़ पर लिख देना इसका सबसे सस्ता इलाज है, क्योंकि दिमाग उन्हें याद रखने का काम छोड़ देता है। लंबी सांसें, हल्की स्ट्रेचिंग या बिना स्क्रीन वाली किताब भी काम करती है। बिस्तर पर लेटकर फोन चलाना उलटा असर करता है, क्योंकि दिमाग बिस्तर को जागने की जगह के तौर पर सीखने लगता है। अगर बीस मिनट में नींद न आए तो उठकर कम रोशनी में कुछ शांत काम कीजिए और नींद आने पर लौटिए। तनाव वाले दिनों के लिए तनाव कम करने के उपाय भी मदद करते हैं।

7. दिन में हलचल, लेकिन देर रात नहीं

दिन में शारीरिक थकान नींद की गहराई बढ़ाती है। रोज़ तीस मिनट की तेज़ चाल या कोई भी हलचल काफी है। सिर्फ यह ध्यान रखिए कि तेज़ कसरत सोने से दो घंटे पहले तक खत्म हो जाए, क्योंकि उसके तुरंत बाद शरीर उत्तेजित और गरम रहता है। सुबह और शाम की कसरत के फर्क पर morning vs evening workout में तुलना मौजूद है।

अगर नींद न आना पुरानी और जमी हुई समस्या है, तो रात को नींद नहीं आती, उपाय में इसके कारण और कदम और विस्तार से दिए गए हैं।

दो हफ्ते का सीधा प्लान

पहला हफ्ता, सिर्फ दो बदलाव। रोज़ एक ही समय पर उठना और दोपहर तीन बजे के बाद कैफीन बंद। इस हफ्ते सोने का समय बदलने की कोशिश मत कीजिए और कुछ नया मत जोड़िए। साथ में हर सुबह एक लाइन लिखिए: कितने बजे सोए, कितने बजे उठे, दिन में कितनी थकान रही।

दूसरा हफ्ता, तीन बदलाव जोड़िए। सुबह की दस मिनट की धूप, रात का खाना सोने से ढाई घंटे पहले, और सोने से एक घंटा पहले घर की रोशनी मद्धम और फोन दूसरे कमरे में। दूसरे हफ्ते के आखिर में अपनी डायरी की सात लाइनें पढ़िए और देखिए कि शाम की तलब और दिन की थकान में फर्क आया या नहीं।

फर्क दिखने का पहला सबूत तराजू नहीं है, वह भूख और तलब है। अगर दो हफ्ते बाद शाम की मीठे की तलब कम हुई है और देर रात कुछ खाने की आदत घटी है, तो नींद अपना काम कर रही है। वजन का फर्क इसके चार से आठ हफ्ते बाद दिखता है।

जो काम नहीं करता

पहला, हफ्ते भर की कमी को रविवार को पूरा करने की कोशिश। एक लंबी नींद थकान घटाती है, लेकिन भूख के हार्मोन और इंसुलिन पर हुए असर को पूरी तरह नहीं पलटती।

दूसरा, मन से नींद की गोली या सप्लीमेंट शुरू करना। ये कारण का इलाज नहीं करते, कई बार निर्भरता बना देते हैं, और असली वजह छिपा देते हैं। नींद के लिए कोई भी चीज़ लेने से पहले डॉक्टर से बात कीजिए।

तीसरा, रात में स्क्रीन चलाते हुए जल्दी सो जाने का इंतज़ार। नींद का इंतज़ार करते हुए फोन चलाना सोने का समय हर रात थोड़ा आगे धकेलता है।

चौथा, नींद के नाम पर एक ही रात में दस बदलाव। नई चादर, नया समय, नया ऐप, नया रूटीन, सब एक साथ। तीन दिन में सब छूट जाता है। एक बार में दो बदलाव सबसे ज़्यादा टिकते हैं।

पांचवां, नींद ठीक करके बाकी सब वैसा ही रखना। नींद डाइट का विकल्प नहीं है। वह डाइट को निभाने लायक बनाती है, उसकी जगह नहीं लेती।

कब डॉक्टर से मिलना चाहिए

अगर नींद न आना तीन हफ्ते से ज़्यादा लगातार बना हुआ है, अगर तेज़ खर्राटे आते हैं या घर के लोग बताते हैं कि नींद में सांस रुकती है, अगर आठ घंटे सोने के बाद भी दिन भर नींद आती है, अगर सुबह सिरदर्द के साथ उठते हैं, या अगर वजन बिना किसी बदलाव के तेज़ी से बढ़ रहा है, तो यह घरेलू उपायों का दायरा नहीं है। इनके पीछे स्लीप एप्निया, थायराइड की गड़बड़ी, खून की कमी, या हार्मोन से जुड़ी कोई स्थिति हो सकती है, जिनकी जांच आसान है और इलाज मौजूद है। थायराइड और वजन का रिश्ता समझने के लिए थायराइड में वजन कैसे कम करें पढ़ सकते हैं, लेकिन जांच की जगह कोई लेख नहीं ले सकता।

नींद के साथ लगातार उदासी, किसी काम में मन न लगना या घबराहट भी हो, तो यह भी डॉक्टर से बात करने की वजह है, क्योंकि नींद और मन की स्थिति एक दूसरे को दोनों तरफ से प्रभावित करते हैं।

मिलाकर बात यह है

नींद वजन का सबसे सस्ता और सबसे कम आज़माया गया कदम है। यह कैलोरी नहीं जलाती, लेकिन यह तय करती है कि आप दिन भर कितनी भूख महसूस करेंगे, कौन सा खाना चुनेंगे, कितना हिलेंगे, और डाइट के दौरान चर्बी घटेगी या मांसपेशी।

अगर आप महीनों से डाइट और एक्सरसाइज़ पर मेहनत कर रहे हैं और नतीजा रुका हुआ है, तो अगला कदम और सख्त डाइट नहीं है। अगला कदम एक ऐसा हफ्ता है जिसमें आप रोज़ एक समय पर उठते हैं, दोपहर के बाद चाय बंद रखते हैं, और सात घंटे बिस्तर पर देते हैं। यह उन कुछ चीज़ों में से है जिनका फायदा वजन से बहुत आगे तक जाता है।

रोज़ की आदतों को निभाने वाला हिस्सा ही सबसे मुश्किल है। SuperLiving पर 20+ कोच हिंदी और हिंग्लिश में आपकी नींद, आपकी शिफ्ट और आपके खाने के हिसाब से छोटे कदम तय करते हैं, ताकि यह एक और लंबी सूची नहीं बल्कि रोज़ निभाने लायक तरीका बने।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या सिर्फ नींद पूरी करने से वजन कम हो जाएगा? अकेले नींद से वजन कम नहीं होता, लेकिन नींद के बिना डाइट और एक्सरसाइज़ का असर काफी घट जाता है। पांच या छह घंटे सोने वालों में भूख बढ़ाने वाला हार्मोन ऊपर और पेट भरने का संकेत देने वाला हार्मोन नीचे चला जाता है, इसलिए वही डाइट निभाना कई गुना मुश्किल लगता है। सही मतलब यह है कि नींद तीसरा खंभा है, पहला नहीं। कैलोरी का हिसाब और हलचल अपनी जगह ज़रूरी रहेंगे।

वजन के लिए कितने घंटे की नींद सही है? आमतौर पर सात से नौ घंटे की सलाह दी जाती है, और वजन से जुड़े अध्ययनों में साफ फर्क सात घंटे के आसपास दिखता है। घंटे गिनने से ज़्यादा भरोसेमंद तीन संकेत हैं: अलार्म के आसपास अपने आप आंख खुलना, दिन के पहले आधे हिस्से में झपकी न आना, और शाम तक मीठे की तेज़ तलब न लगना। छुट्टी के दिन रोज़ से दो घंटे ज़्यादा सोना इशारा है कि कमी जमा हो रही है।

देर रात भूख क्यों लगती है और उस समय क्या करें? देर रात की भूख अक्सर असली भूख नहीं होती। जागने के घंटे बढ़ने से भूख का हार्मोन ऊपर रहता है और थका दिमाग तुरंत ऊर्जा देने वाली चीज़ों की तरफ खिंचता है। इसे रात में लड़कर नहीं, दिन ठीक करके संभालिए, यानी हर मील में प्रोटीन और रात का खाना सोने से दो से तीन घंटे पहले। भूख फिर भी लगे तो दही, मूंगफली या भुना चना जैसा छोटा प्रोटीन वाला हिस्सा लीजिए, बिस्किट और नमकीन नहीं।

रात की शिफ्ट में काम करने वालों का क्या हो? यहां लक्ष्य आदर्श नींद नहीं, नुकसान कम करना है। सोने का समय हर दिन एक जैसा रखिए, चाहे वह दिन में हो, और कमरे को मोटे पर्दों से पूरी तरह अंधेरा कीजिए। शिफ्ट के आखिरी घंटों में कैफीन बंद कीजिए और शिफ्ट के दौरान खाने का समय तय रखिए, भारी तला हुआ खाना रात के बीच में नहीं। शिफ्ट वालों में वजन और शुगर से जुड़ी दिक्कतें ज़्यादा देखी जाती हैं, इसलिए साल में एक बार जांच करा लेना समझदारी है।

दोपहर की झपकी लेना ठीक है या नुकसानदेह? छोटी झपकी मददगार है, लंबी झपकी उलटा असर करती है। बीस से तीस मिनट थकान घटाते हैं और शाम की तलब कम करते हैं। एक घंटे से ज़्यादा की झपकी, खासकर शाम चार बजे के बाद, रात की नींद का दबाव कम कर देती है और वही चक्र दोहराता है। अगर रोज़ लंबी झपकी की ज़रूरत पड़ रही है तो असली सवाल रात की नींद की गुणवत्ता है।

नींद ठीक करने पर वजन में फर्क कितने दिन में दिखता है? भूख और तलब में फर्क पहले हफ्ते के भीतर आ सकता है क्योंकि हार्मोन कुछ ही रातों में सुधरने लगते हैं। तराजू पर फर्क धीमा है, उसे चार से आठ हफ्ते दीजिए, क्योंकि नींद खुद कैलोरी नहीं जलाती, वह आपके फैसलों को आसान बनाती है। शुरुआत में पानी की मात्रा बदलने से वजन एक दो दिन ऊपर भी दिख सकता है, इसलिए हफ्ते में एक बार एक ही समय पर तौलिए।

खर्राटे आते हैं और फिर भी दिन भर थकान रहती है, क्या यह सामान्य है? यह सामान्य नहीं है। तेज़ खर्राटे, नींद में सांस रुकने जैसा महसूस होना, घुटन के साथ जागना, सुबह सिरदर्द और आठ घंटे सोने के बाद भी दिन भर नींद आना, ये स्लीप एप्निया की तरफ इशारा कर सकते हैं। यह स्थिति वजन बढ़ने से जुड़ी है और वजन घटाना मुश्किल भी बनाती है। इसकी जांच और इलाज मौजूद है, इसलिए घरेलू उपायों में महीने लगाने के बजाय डॉक्टर से नींद की जांच के बारे में बात कीजिए।

SuperLiving जीवनशैली और वेलनेस सहायता देता है और यह चिकित्सकीय सलाह, निदान या इलाज का विकल्प नहीं है। लंबे समय से चली आ रही अनिद्रा, तेज़ खर्राटे, नींद में सांस रुकने जैसा महसूस होना, या बिना वजह वजन बढ़ने के लिए कृपया योग्य डॉक्टर से सलाह लें। नींद के लिए कोई भी दवा या सप्लीमेंट अपने मन से शुरू न करें।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या सिर्फ नींद पूरी करने से वजन कम हो जाएगा?+

अकेले नींद से वजन कम नहीं होता, लेकिन नींद के बिना डाइट और एक्सरसाइज़ का असर काफी घट जाता है। जिन लोगों की नींद पांच या छह घंटे की रह जाती है, उनमें भूख बढ़ाने वाला हार्मोन ऊपर और पेट भरने का संकेत देने वाला हार्मोन नीचे चला जाता है, इसलिए वही डाइट निभाना कई गुना मुश्किल लगता है। इसका सही मतलब यह है कि नींद वजन घटाने का तीसरा खंभा है, पहला नहीं। कैलोरी का हिसाब और हलचल अपनी जगह ज़रूरी रहेंगे। हां, अगर आप महीनों से डाइट कर रहे हैं और नतीजा नहीं आ रहा, और नींद छह घंटे से कम है, तो सबसे सस्ता और सबसे कम आज़माया गया कदम नींद ठीक करना ही है।

वजन के लिए कितने घंटे की नींद सही है?+

बड़ी उम्र के लोगों के लिए आमतौर पर सात से नौ घंटे की सलाह दी जाती है, और वजन से जुड़े अध्ययनों में सबसे साफ फर्क सात घंटे के आसपास दिखता है। लेकिन घंटे गिनने से ज़्यादा भरोसेमंद तीन संकेत हैं: सुबह अलार्म से पहले या अलार्म के साथ अपने आप आंख खुल जाना, दिन के पहले आधे हिस्से में झपकी न आना, और शाम तक मीठे या चाय की तेज़ तलब न लगना। अगर छुट्टी वाले दिन आप रोज़ से दो घंटे ज़्यादा सोते हैं, तो यह इशारा है कि हफ्ते भर नींद की कमी जमा हो रही है। दस घंटे से ज़्यादा सोने पर भी थकान बनी रहे तो वजह नींद की मात्रा नहीं, गुणवत्ता है।

देर रात भूख क्यों लगती है और उस समय क्या करें?+

देर रात की भूख अक्सर असली भूख नहीं होती। जागने के घंटे बढ़ने से भूख का हार्मोन ऊपर रहता है, दिमाग थका होने पर तुरंत ऊर्जा देने वाली चीज़ों की तरफ खिंचता है, और दिन भर प्रोटीन कम रहा हो तो शरीर रात में हिसाब बराबर करने की कोशिश करता है। इसे संभालने का सबसे असरदार तरीका रात में लड़ना नहीं, बल्कि दिन ठीक करना है, यानी हर मील में प्रोटीन और रात का खाना सोने से दो से तीन घंटे पहले। अगर भूख फिर भी लगे तो एक कटोरी दही, मूंगफली या भुना चना जैसा प्रोटीन वाला छोटा हिस्सा लीजिए, बिस्किट और नमकीन नहीं, क्योंकि वे आधे घंटे में तलब दोबारा लौटा देते हैं।

रात की शिफ्ट में काम करने वालों का क्या हो?+

रात की शिफ्ट शरीर की घड़ी के खिलाफ जाती है, इसलिए यहां लक्ष्य आदर्श नींद नहीं बल्कि नुकसान कम करना है। तीन चीज़ें सबसे ज़्यादा मदद करती हैं। पहला, सोने का समय हर दिन एक जैसा रखना, चाहे वह दिन में हो, और कमरे को पर्दों से पूरी तरह अंधेरा करना, क्योंकि रोशनी में शरीर गहरी नींद में नहीं जाता। दूसरा, शिफ्ट के आखिरी घंटों में कैफीन बंद करना, वरना घर पहुंचकर नींद नहीं आएगी। तीसरा, शिफ्ट के दौरान खाने का समय तय रखना और भारी तला हुआ खाना रात के बीच में न लेना। शिफ्ट वालों में वजन और शुगर से जुड़ी दिक्कतें ज़्यादा देखी जाती हैं, इसलिए साल में एक बार जांच करा लेना समझदारी है।

दोपहर की झपकी लेना ठीक है या नुकसानदेह?+

छोटी झपकी मददगार है, लंबी झपकी उलटा असर करती है। बीस से तीस मिनट की झपकी थकान घटाती है, ध्यान सुधारती है और शाम की तलब कम करती है। एक घंटे से ज़्यादा की झपकी, खासकर शाम चार बजे के बाद, रात की नींद का दबाव कम कर देती है, जिससे रात में देर तक नींद नहीं आती और अगले दिन वही चक्र दोहराता है। इसलिए झपकी को रात की नींद का विकल्प मत बनाइए। अगर रोज़ लंबी झपकी लेने की ज़रूरत पड़ रही है, तो असली सवाल यह है कि रात की नींद में क्या कमी है, और उस पर काम करना ज़्यादा फायदेमंद है।

नींद ठीक करने पर वजन में फर्क कितने दिन में दिखता है?+

भूख और तलब में फर्क सबसे पहले आता है, अक्सर पहले हफ्ते के भीतर, क्योंकि हार्मोन कुछ ही रातों में सुधरने लगते हैं। तराजू पर फर्क धीमा है और उसे चार से आठ हफ्ते दीजिए, क्योंकि नींद खुद कैलोरी नहीं जलाती, वह आपके खाने और हलचल के फैसलों को आसान बनाती है और असर उन्हीं के ज़रिए आता है। शुरुआत में वजन एक या दो दिन ऊपर भी दिख सकता है क्योंकि पानी की मात्रा बदलती है। इसलिए रोज़ तौलने के बजाय हफ्ते में एक बार, एक ही समय पर, एक जैसे कपड़ों में तौलिए और चार हफ्ते का औसत देखिए।

खर्राटे आते हैं और फिर भी दिन भर थकान रहती है, क्या यह सामान्य है?+

यह सामान्य नहीं है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। तेज़ खर्राटे, नींद में सांस रुकने जैसा महसूस होना या घुटन के साथ जागना, सुबह सिरदर्द, और आठ घंटे सोने के बाद भी दिन भर नींद आना, ये स्लीप एप्निया की तरफ इशारा कर सकते हैं, जिसमें नींद के दौरान सांस बार बार रुकती है। यह स्थिति वजन बढ़ने से भी जुड़ी है और वजन घटाना मुश्किल भी बनाती है, और यह दोनों तरफ काम करता है। इसकी जांच और इलाज मौजूद है, इसलिए घरेलू उपायों में महीने लगाने के बजाय डॉक्टर से मिलकर नींद की जांच के बारे में बात करना सही कदम है।

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