नींद और वजन का संबंध: कम सोने से वजन क्यों बढ़ता है
छोटा जवाब
कम नींद खुद से चर्बी नहीं बनाती, लेकिन यह शरीर के भीतर चार ऐसे बदलाव कर देती है जिनके बाद वजन बढ़ना लगभग तय हो जाता है। पहला, भूख बढ़ाने वाला हार्मोन ऊपर चला जाता है और पेट भरने का संकेत देने वाला हार्मोन नीचे आ जाता है, इसलिए उतना ही खाना खाकर भी संतुष्टि नहीं मिलती। दूसरा, तनाव वाला हार्मोन कोर्टिसोल दिन भर ऊंचा बना रहता है, जो पेट के आसपास चर्बी जमा होने से जुड़ा है। तीसरा, शरीर की इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता कुछ ही खराब रातों में घट जाती है, यानी वही रोटी और चावल पहले से ज़्यादा असर डालते हैं। चौथा, थकान की वजह से दिन भर की सामान्य हलचल अपने आप घट जाती है और दिमाग तुरंत ऊर्जा देने वाली मीठी और तली हुई चीज़ों की तरफ खिंचता है।
सात से आठ घंटे की नींद इन चारों को उलटी दिशा में मोड़ देती है। इसीलिए नींद को डाइट और एक्सरसाइज़ के बराबर का तीसरा खंभा माना जाता है, और यह वही खंभा है जिस पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है।
ज़रूरी सूचना: यह लेख सामान्य जानकारी और जीवनशैली से जुड़े सुझावों के लिए है और किसी भी तरह से चिकित्सकीय सलाह, निदान या इलाज का विकल्प नहीं है। लंबे समय से चली आ रही अनिद्रा, तेज़ खर्राटे, नींद में सांस रुकने जैसा महसूस होना, या बिना वजह तेज़ी से वजन बढ़ना, इनके पीछे थायराइड, स्लीप एप्निया, हार्मोन से जुड़ी स्थितियां या कोई और स्वास्थ्य समस्या हो सकती है जिसकी जांच ज़रूरी है। कृपया ऐसी स्थिति में योग्य डॉक्टर से सलाह लें। नींद के लिए कोई भी दवा या सप्लीमेंट अपने मन से शुरू न करें।
नींद कम होने पर शरीर के अंदर असल में क्या होता है
लोग मान लेते हैं कि कम सोने का नुकसान सिर्फ थकान है। असल में शरीर कम नींद को एक आपात स्थिति की तरह पढ़ता है, और उस स्थिति में उसका बर्ताव बदल जाता है। नीचे वे बदलाव हैं जो वजन पर सीधा असर डालते हैं।
भूख के दो हार्मोन उलट जाते हैं
भूख और पेट भरने का संकेत दो हार्मोन के तालमेल से बनता है। एक भूख बढ़ाता है और दूसरा दिमाग को बताता है कि अब बस, काफी हो गया। नींद कम होने पर पहला बढ़ जाता है और दूसरा घट जाता है। नतीजा यह होता है कि आपकी थाली वही रहती है, आपकी भूख बढ़ जाती है, और खाना खत्म करने के बाद भी कुछ और खाने का मन बना रहता है।
यही वह जगह है जहां ज़्यादातर लोग खुद को कमज़ोर इच्छाशक्ति वाला समझ बैठते हैं। सच यह है कि आप एक बदले हुए हार्मोन के माहौल में फैसले ले रहे हैं। पांच घंटे सोने के बाद मीठा मना करना और आठ घंटे सोने के बाद मीठा मना करना, ये दो अलग मुश्किलें हैं।
कोर्टिसोल और पेट के आसपास की चर्बी
नींद पूरी न होने पर शरीर तनाव वाले हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर ऊंचा रखता है। कोर्टिसोल का काम शरीर को सतर्क रखना है, लेकिन लगातार ऊंचा रहने पर यह दो चीज़ें करता है: भूख बढ़ाता है और चर्बी को पेट के आसपास जमा करने की तरफ धकेलता है। यही वजह है कि लंबे समय से कम सोने वाले लोगों में वजन का बढ़ना खासकर कमर के घेरे में दिखता है। कमर के आसपास की चर्बी घटाने के बाकी तरीके पेट की चर्बी कम कैसे करें में विस्तार से हैं, लेकिन उनमें से कोई भी नींद ठीक किए बिना अपनी पूरी ताकत से काम नहीं करता।
इंसुलिन का काम मुश्किल हो जाता है
कुछ ही रातों की कम नींद के बाद शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के संकेत पर पहले जितनी तेज़ी से प्रतिक्रिया नहीं देतीं। सीधे शब्दों में, वही खाना खाने पर खून में शुगर पहले से ज़्यादा और ज़्यादा देर तक ऊंची रहती है, और शरीर को उसे संभालने के लिए ज़्यादा इंसुलिन बनाना पड़ता है। ऊंचा इंसुलिन चर्बी जमा करने की तरफ झुका होता है और जमा चर्बी को इस्तेमाल करने में अड़चन डालता है।
अच्छी खबर यह है कि यह बदलाव पलटने वाला है। कुछ रातों की पूरी नींद के बाद यही संवेदनशीलता सुधरने लगती है। बुरी खबर यह है कि हफ्ते भर पांच घंटे सोकर रविवार को दस घंटे सो लेने से हिसाब बराबर नहीं होता।
दिमाग का इनाम वाला हिस्सा तेज़ और रोकने वाला हिस्सा सुस्त
कम नींद के बाद दिमाग का वह हिस्सा जो ज़्यादा कैलोरी वाले खाने को देखकर उत्साहित होता है, ज़्यादा सक्रिय हो जाता है। और वह हिस्सा जो रुककर सोचता है और खुद को रोकता है, सुस्त पड़ जाता है। इसका सीधा नतीजा रसोई में दिखता है। थका हुआ दिमाग समोसा, बिस्किट, चाय और बचा हुआ मीठा चुनता है, दाल चावल सब्ज़ी नहीं। मीठे की तलब को संभालने के व्यावहारिक तरीके how to stop sugar cravings में दिए हैं, और उनमें पहला ही कदम नींद है।
जागने के ज़्यादा घंटे, खाने के ज़्यादा मौके
यह सबसे सीधी बात है और सबसे ज़्यादा नज़रअंदाज़ की जाती है। अगर आप रात एक बजे सोते हैं, तो ग्यारह बजे सोने वाले व्यक्ति के मुकाबले आपके पास खाने के दो अतिरिक्त घंटे हैं, और वे दो घंटे दिन के सबसे कमज़ोर फैसलों वाले घंटे हैं। देर रात कोई सलाद नहीं खाता। रात के इन घंटों में जुड़ने वाली कैलोरी अक्सर तीन सौ से छह सौ के बीच होती है, और यह अकेली आदत महीने भर की मेहनत बराबर कर सकती है।
थकान से दिन भर की हलचल चुपचाप घट जाती है
एक्सरसाइज़ के अलावा भी हम दिन भर कैलोरी खर्च करते हैं: चलना, खड़े रहना, सीढ़ियां, घर का काम, बात करते हुए हिलना डुलना। थकान इस पूरे हिस्से को चुपचाप कम कर देती है। लिफ्ट चुनना, ऑटो लेना, शाम की सैर टाल देना, ये फैसले सचेत नहीं होते, ये थकान के होते हैं। यही वजह है कि जिम की एक घंटे की मेहनत के बाद भी कुल खर्च कम रह जाता है। मेटाबोलिज़्म को असल में क्या बढ़ाता है, इस पर how to boost metabolism में पूरा हिसाब है।
डाइट पर हों तो नुकसान दोगुना
यह हिस्सा सबसे ज़रूरी है। जब कोई कैलोरी कम करके वजन घटाता है, तो शरीर चर्बी और मांसपेशी दोनों में से कुछ न कुछ खोता है। नींद कम होने पर यह अनुपात बिगड़ जाता है और मांसपेशी का नुकसान बढ़ जाता है। मांसपेशी घटने का मतलब है आराम की हालत में जलने वाली कैलोरी घटना, यानी अगली बार वजन घटाना पहले से मुश्किल। इसलिए डाइट के दौरान कम सोना दोगुना घाटा है: आज भूख बढ़ती है और कल का मेटाबोलिज़्म कमज़ोर होता है।
कितनी नींद चाहिए, और कैसे पता चले कि पूरी हो रही है
बड़ी उम्र के लोगों के लिए आमतौर पर सात से नौ घंटे की सलाह दी जाती है। लेकिन घंटे गिनने से ज़्यादा भरोसेमंद चार संकेत हैं।
पहला, सुबह अलार्म बजने से पहले या उसके आसपास अपने आप आंख खुलना, बार बार स्नूज़ दबाए बिना। दूसरा, दिन के पहले आधे हिस्से में झपकी न आना, खासकर दोपहर के खाने के बाद बेकाबू नींद न आना। तीसरा, शाम को चाय, कॉफी या मीठे की तेज़ तलब न लगना। चौथा, छुट्टी वाले दिन आपकी नींद रोज़ से दो घंटे से ज़्यादा लंबी न होना, क्योंकि लंबी छुट्टी वाली नींद इशारा है कि हफ्ते भर कमी जमा हो रही थी।
इनमें से दो या ज़्यादा संकेत बिगड़े हुए हों तो आपके पास नींद की एक असली कमी है, चाहे आप खुद को इसकी आदत लगने की बात कहते हों। आदत लगने का मतलब सिर्फ यह होता है कि थकान महसूस होना बंद हो गया, नुकसान होना बंद नहीं हुआ।
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