हिंदी

डायबिटीज़ के शुरुआती लक्षण और कारण: कैसे पहचानें और कब जांच कराएं

SuperLiving Expert Team·

डायबिटीज़ के शुरुआती लक्षण और कारण, कैसे पहचानें और कब जांच कराएं

छोटा जवाब

अगर आपको बार बार प्यास लगती है, उसी वजह से बार बार पेशाब जाना पड़ता है, नींद पूरी करने के बाद भी थकान बनी रहती है, या वज़न बिना कोशिश के घट रहा है, तो ये डायबिटीज़ के कुछ सबसे आम शुरुआती लक्षण हो सकते हैं. लेकिन बहुत से लोगों में शुरुआत में कोई साफ लक्षण दिखता ही नहीं, इसलिए उम्र, वज़न और पारिवारिक इतिहास के हिसाब से समय समय पर जांच कराना सबसे भरोसेमंद रास्ता है.

डायबिटीज़ असल में होता क्या है

शरीर जो कुछ खाता है, उसे पचाकर ग्लूकोज़ यानी शक्कर में बदल देता है, जो खून के ज़रिए हर कोशिका तक पहुंचकर ऊर्जा बनती है. यह काम एक हार्मोन करता है, जिसे इंसुलिन कहते हैं.

डायबिटीज़ में यही तालमेल गड़बड़ा जाता है. या तो शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता, या कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति पहले जैसी संवेदनशील नहीं रहतीं. नतीजा एक जैसा होता है, खून में शक्कर ज़रूरत से ज़्यादा बनी रहने लगती है. यह अक्सर सालों में बनने वाली धीमी प्रक्रिया है, इसीलिए शुरुआती लक्षण इतने हल्के और नज़रअंदाज़ होने वाले लगते हैं.

शुरुआती लक्षण जो अक्सर पकड़ में नहीं आते

डायबिटीज़ के लक्षण किसी झटके की तरह नहीं आते, बल्कि धीरे धीरे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में घुल जाते हैं.

बार बार प्यास लगना और मुंह सूखना. खून में शक्कर ज़्यादा होने पर शरीर गुर्दों के ज़रिए उसे बाहर निकालता है, और साथ में ज़्यादा पानी भी निकलता है, इसलिए बार बार प्यास लगती है.

बार बार पेशाब जाना, खासकर रात में. ज़्यादा पानी पीने का सीधा नतीजा ज़्यादा पेशाब है. अगर रात में दो तीन बार उठना पड़ रहा है और पहले नहीं होता था, तो इसे हल्के में न लें.

नींद पूरी होने के बाद भी थकान. कोशिकाओं को ग्लूकोज़ सही तरीके से नहीं मिलता, इसलिए थकान आराम के बाद भी पूरी तरह नहीं जाती.

बिना कोशिश के वज़न घटना. जब कोशिकाओं को ग्लूकोज़ से ऊर्जा नहीं मिलती, तो शरीर मांसपेशियों और चर्बी को तोड़कर ऊर्जा बनाने लगता है. यह टाइप 1 में ज़्यादा साफ दिखता है, टाइप 2 में भी कुछ लोगों में हो सकता है.

धुंधला दिखना. ज़्यादा शक्कर आंखों के लेंस के आस पास पानी की मात्रा को प्रभावित कर सकती है, जिससे कुछ समय के लिए नज़र धुंधली लगती है और शुगर सामान्य होने पर सुधर जाती है.

घाव या कट का देर से भरना, और बार बार इन्फेक्शन. ज़्यादा शक्कर खून का बहाव और मरम्मत की क्षमता धीमी कर देती है. मसूड़ों में सूजन, त्वचा में खुजली और यूरिन इन्फेक्शन का बार बार लौटना भी इसी का हिस्सा हो सकते हैं.

हाथ पैरों में झनझनाहट या सुन्नपन. शुगर लंबे समय से ज़्यादा चलने पर नसों पर असर पड़ता है, जिससे उंगलियों में हल्की झनझनाहट महसूस हो सकती है.

यह सूची जांच की जगह नहीं ले सकती. इनमें से लगभग हर लक्षण थायराइड, खून की कमी, नींद की कमी या तनाव में भी दिख सकता है, इसलिए पक्का पता सिर्फ ब्लड टेस्ट से चलता है.

टाइप 1 और टाइप 2 के लक्षणों में फर्क

टाइप 1 डायबिटीज़ में लक्षण अक्सर तेज़ी से, कुछ हफ्तों के अंदर सामने आते हैं, और यह ज़्यादातर बच्चों या युवाओं में देखी जाती है, हालांकि किसी भी उम्र में हो सकती है. इसमें इम्यून सिस्टम इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है, इसलिए शरीर इंसुलिन बनाना लगभग बंद कर देता है. तेज़ी से वज़न घटना, बहुत ज़्यादा प्यास और थकान इसमें आमतौर पर साफ और जल्दी दिखते हैं.

टाइप 2 डायबिटीज़ धीरे धीरे, कई सालों में बनती है, और ज़्यादातर वयस्कों में देखी जाती है, हालांकि अब कम उम्र में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं. इसमें शरीर इंसुलिन बनाता है, पर कोशिकाएं उसके प्रति पहले जैसी संवेदनशील नहीं रहतीं. यही वजह है कि इसमें लक्षण महीनों या सालों तक बिना पहचाने रह सकते हैं, और कई बार पहला संकेत किसी और वजह से कराई गई जांच में मिलता है.

डायबिटीज़ होने के मुख्य कारण

डायबिटीज़ किसी एक कारण से नहीं होती, कई चीज़ें मिलकर इसका रास्ता बनाती हैं.

इंसुलिन रेज़िस्टेंस. टाइप 2 की जड़ में अक्सर यही होता है. समय के साथ कोशिकाएं इंसुलिन के संकेत को पहले जैसी अच्छी तरह नहीं समझतीं, जिससे शक्कर काबू में रखने के लिए शरीर को ज़्यादा इंसुलिन बनानी पड़ती है, और आखिरकार यह तालमेल टूटने लगता है.

ज़्यादा वज़न, खासकर पेट की चर्बी. पेट के आस पास की चर्बी सिर्फ दिखने में फर्क नहीं डालती, यह ऐसे रसायन छोड़ती है जो इंसुलिन के काम करने के तरीके को प्रभावित करते हैं. इसलिए पेट की चर्बी कम करना डायबिटीज़ का खतरा घटाने में भी मदद करता है.

कम हलचल वाली दिनचर्या. ज़्यादातर समय बैठकर बिताने वाले लोगों की मांसपेशियां ग्लूकोज़ का इस्तेमाल उतनी सक्रियता से नहीं करतीं. नियमित हलचल कोशिकाओं को इंसुलिन के प्रति फिर से संवेदनशील बनाने में मदद करती है.

पारिवारिक इतिहास और जीन. परिवार में मां, पिता या भाई बहन को डायबिटीज़ रही हो तो खतरा अपने आप बढ़ जाता है. जीन अकेले बीमारी तय नहीं करते, पर वे तय करते हैं कि आपका शरीर लाइफस्टाइल के असर के प्रति कितना संवेदनशील है.

नींद की कमी और लगातार तनाव. खराब नींद और लंबे समय का तनाव ऐसे हार्मोन बढ़ाते हैं जो ब्लड शुगर और इंसुलिन का तालमेल बिगाड़ सकते हैं, बाकी कारणों के साथ मिलकर असर को और बढ़ा देते हैं.

उम्र. पैंतालीस साल के बाद खतरा स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगता है, क्योंकि इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता धीरे धीरे कम होती जाती है, इसलिए इस उम्र के बाद जांच की ज़रूरत भी बढ़ जाती है.

टाइप 1 की कहानी अलग है, उसमें लाइफस्टाइल की भूमिका सीमित है और इसका संबंध शरीर के अपने इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया से होता है.

लक्षण पहचानना पहला कदम है, रोज़ की आदत बदलना असली काम है. SuperLiving पर 20+ कोच हिंदी और हिंग्लिश में आपकी दिनचर्या, खानपान और नींद के हिसाब से छोटे कदम तय करते हैं, ताकि जांच का नतीजा चाहे जो भी हो, आगे का रास्ता आसान लगे. SuperLiving डाउनलोड करें

यह सब खुद करने की ज़रूरत नहीं है

SuperLiving पर 20+ expert coaches आपकी थाली के हिसाब से प्लान बनाते हैं. शुरुआत फ्री.

फ्री में शुरू करें

प्रीडायबिटीज़, वह स्टेज जिसे सबसे ज़्यादा नज़रअंदाज़ किया जाता है

प्रीडायबिटीज़ वह स्थिति है जहां ब्लड शुगर सामान्य से ज़्यादा है, पर इतना ज़्यादा नहीं कि उसे डायबिटीज़ कहा जाए. इसमें अक्सर कोई लक्षण नहीं दिखता, इसलिए यह पूरी तरह जांच पर निर्भर करती है.

यही वह स्टेज है जहां सबसे ज़्यादा मौका होता है. प्रीडायबिटीज़ का मतलब यह नहीं कि डायबिटीज़ होना तय है. वज़न में थोड़ा सुधार, खानपान में बदलाव और नियमित हलचल जोड़कर कई लोग शुगर वापस सामान्य दायरे के करीब ला पाते हैं. दिक्कत यह है कि कोई लक्षण न दिखने की वजह से लोग इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लेते, और सालों बाद यही स्थिति डायबिटीज़ में बदल जाती है.

किन लोगों में खतरा ज़्यादा है

कुछ समूहों में खतरा बाकी लोगों से ज़्यादा माना जाता है, इनमें पारिवारिक इतिहास वाले, ज़्यादा वज़न खासकर पेट की चर्बी वाले, ज़्यादातर समय बैठकर काम करने वाले, प्रेगनेंसी में शुगर बढ़ने का इतिहास रखने वाली महिलाएं, पहले से हाई ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल वाले, और पैंतालीस साल से ऊपर की उम्र वाले लोग शामिल हैं.

अगर आप इनमें से किसी समूह में आते हैं, तो बिना लक्षण दिखे भी नियमित अंतराल पर जांच कराना समझदारी है, सही अंतराल डॉक्टर से तय करवाएं.

जांच कब और कैसे करानी चाहिए

अगर ऊपर बताए लक्षणों में से कोई लगातार बना हुआ है, तो सबसे पहला कदम डॉक्टर से मिलकर जांच कराना है. आम जांचों में खाली पेट का ब्लड शुगर टेस्ट, खाना खाने के दो घंटे बाद का टेस्ट, और तीन महीने के औसत शुगर स्तर की जांच शामिल हैं. कौन सी जांच कब करानी है, यह डॉक्टर तय करते हैं.

लक्षण न होने पर भी जोखिम वाले समूह में आते हैं तो जांच को साल में एक बार की आदत बनाना बेहतर है. जल्दी पहचान का सबसे बड़ा फायदा यह है कि प्रीडायबिटीज़ या शुरुआती स्टेज पर लाइफस्टाइल बदलाव का असर सबसे ज़्यादा और सबसे आसान होता है.

डायबिटीज़ को लेकर आम मिथक

मिथक, सिर्फ ज़्यादा मीठा खाने से डायबिटीज़ होती है. मीठा अकेला कारण नहीं, कुल कैलोरी, कम हलचल, वज़न, नींद और पारिवारिक इतिहास सब मिलकर तस्वीर बनाते हैं.

मिथक, पतले लोगों को डायबिटीज़ नहीं होती. गलत. वज़न बड़ा जोखिम कारक है, पर पतले लोगों में भी पारिवारिक इतिहास और उम्र की वजह से यह हो सकती है.

मिथक, लक्षण न दिखें तो जांच की ज़रूरत नहीं. यह सबसे खतरनाक मिथक है. टाइप 2 के ज़्यादातर मामलों में शुरुआती सालों में कोई साफ लक्षण नहीं दिखता, इसलिए जोखिम वाले समूहों के लिए बिना लक्षण जांच कराना ही भरोसेमंद तरीका है.

मिथक, एक बार डायबिटीज़ हो जाए तो जीवन सामान्य नहीं रह सकता. गलत. सही जांच, डॉक्टर की देखरेख और लाइफस्टाइल बदलाव के साथ बहुत से लोग पूरी तरह सक्रिय और सामान्य ज़िंदगी जीते हैं.

डॉक्टर से कब मिलना ज़रूरी है

अगर बार बार प्यास, बार बार पेशाब, अचानक वज़न घटना या धुंधला दिखना जैसे लक्षण कुछ हफ्तों से ज़्यादा बने हुए हैं, तो इंतज़ार करने की बजाय जल्द डॉक्टर से मिलें. अगर आप पहले से जोखिम वाले समूह में हैं, तो भी लक्षण न होने पर सालाना जांच की आदत बनाएं. जांच में देरी करने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि जो स्टेज सबसे आसानी से संभाली जा सकती थी, वह और आगे बढ़ जाती है.

मिलाकर बात यह है

डायबिटीज़ के शुरुआती लक्षण अक्सर इतने हल्के होते हैं कि रोज़मर्रा की थकान या उम्र का असर समझकर नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं. बार बार प्यास, बार बार पेशाब, बिना कारण थकान और देर से भरने वाले घाव, ये सब मिलकर एक तस्वीर बनाते हैं. साथ ही बहुत से मामलों में कोई लक्षण दिखता ही नहीं, इसलिए वज़न, पारिवारिक इतिहास और उम्र के आधार पर समय समय पर जांच कराना ही सबसे भरोसेमंद रास्ता है.

अगर जांच में शुगर बढ़ी हुई निकलती है, तो घबराने की बजाय अगला कदम उठाना ज़्यादा फायदेमंद है, डॉक्टर की सलाह के साथ खानपान और दिनचर्या को धीरे धीरे सुधारना. इसके लिए डायबिटीज़ के लिए डाइट चार्ट और शुगर कंट्रोल डाइट चार्ट दोनों आर्टिकल आगे का रास्ता समझने में मदद करेंगे.

अगर आप चाहते हैं कि जांच के बाद कोई आपकी दिनचर्या, खानपान और नींद के हिसाब से रोज़ साथ चले, तो SuperLiving पर Coach Tara समेत 20+ कोच हैं जो हिंदी और हिंग्लिश में बात करते हुए आपकी रोज़ की आदतों को छोटे, संभलने लायक कदमों में बांटते हैं. आप SuperLiving को मुफ़्त में शुरू करें और देखें कि सही जानकारी और थोड़े साथ से यह सफर कितना आसान लग सकता है.

SuperLiving एक lifestyle और wellness सहारा है, किसी डॉक्टरी इलाज या जांच का विकल्प नहीं. डायबिटीज़ की पहचान और इलाज सिर्फ जांच और डॉक्टर की सलाह से हो सकता है, इसलिए ऊपर बताए किसी भी लक्षण के लगातार बने रहने पर कृपया डॉक्टर से मिलें.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

डायबिटीज़ का सबसे पहला लक्षण क्या होता है? किसी एक तय लक्षण का नाम लेना मुश्किल है, शुरुआत में अक्सर कई मामूली संकेत साथ आते हैं. सबसे आम शुरुआत बार बार प्यास और उसी वजह से बार बार पेशाब है, साथ में एक ऐसी थकान जो नींद पूरी करने के बाद भी नहीं जाती. कुछ लोगों में वज़न बिना कोशिश के कम होने लगता है, तो कुछ में धुंधला दिखना पहले दिखता है.

क्या बिना किसी लक्षण के भी डायबिटीज़ हो सकती है? हां, और यही टाइप 2 की सबसे बड़ी दिक्कत है. बहुत से लोगों में शुरुआती सालों में कोई साफ लक्षण नहीं दिखता, ब्लड शुगर धीरे धीरे बढ़ता रहता है और शरीर इसे झेलता रहता है. इसलिए उम्र, वज़न और पारिवारिक इतिहास के आधार पर बिना लक्षण के भी बीच बीच में जांच कराने की सलाह दी जाती है.

डायबिटीज़ होने का सबसे बड़ा कारण क्या है? कोई एक अकेला कारण नहीं होता, कई चीज़ें मिलकर असर डालती हैं. टाइप 2 में कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं, जिसे इंसुलिन रेज़िस्टेंस कहते हैं, और इसके पीछे ज़्यादा वज़न, कम हलचल, नींद की कमी और पारिवारिक इतिहास सबका हाथ होता है. टाइप 1 अलग है, उसमें इम्यून सिस्टम का सीधा असर होता है.

प्रीडायबिटीज़ और डायबिटीज़ में क्या फर्क है? प्रीडायबिटीज़ वह स्थिति है जहां ब्लड शुगर सामान्य से ज़्यादा है, पर इतना नहीं कि उसे डायबिटीज़ कहा जाए. यह चेतावनी की स्थिति है, बीमारी का पक्का ऐलान नहीं. इस स्टेज पर खानपान, हलचल और वज़न में बदलाव लाकर शुगर सामान्य दायरे के करीब लाने की गुंजाइश काफी ज़्यादा होती है.

किन लोगों को डायबिटीज़ की जांच जल्दी करानी चाहिए? जिनके परिवार में डायबिटीज़ रही हो, जिनका वज़न ज़्यादा है, जो ज़्यादातर समय बैठकर काम करते हैं, जिन महिलाओं को प्रेगनेंसी में शुगर बढ़ी थी, या जिन्हें हाई ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल की दिक्कत है, उनमें खतरा बाकी लोगों से ज़्यादा माना जाता है. इन ग्रुप्स के लिए बिना लक्षण के भी साल में एक बार जांच कराना समझदारी है.

क्या शुरुआती लक्षण दिखने पर डायबिटीज़ को उलटा जा सकता है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि स्थिति कितनी आगे बढ़ चुकी है. प्रीडायबिटीज़ और शुरुआती टाइप 2 में कई लोगों को वज़न कम करने, खानपान सुधारने और नियमित हलचल से मदद मिलती है, हालांकि यह नतीजा हर किसी के लिए एक जैसा नहीं होता, और हर बदलाव डॉक्टर की देखरेख में होना चाहिए.

SuperLiving

अपना डाइट प्लान 2 मिनट में बनाएं

घर का खाना खाकर वजन कम करें. 20+ expert coaches से हिंदी में बात करें, जब चाहें. शुरुआत फ्री, उसके बाद ₹199 प्रति महीना.

फ्री में शुरू करें

10 लाख+ डाउनलोड, Google Play पर उपलब्ध

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

डायबिटीज़ का सबसे पहला लक्षण क्या होता है?+

किसी एक तय लक्षण का नाम लेना मुश्किल है, क्योंकि शुरुआत में अक्सर कई मामूली संकेत साथ में आते हैं. सबसे आम शुरुआत बार बार प्यास लगना और उसी वजह से बार बार पेशाब जाना है, साथ में एक ऐसी थकान जो नींद पूरी करने के बाद भी नहीं जाती. कुछ लोगों में वज़न बिना कोशिश के कम होने लगता है, तो कुछ में धुंधला दिखना या घाव के देर से भरने जैसे संकेत पहले दिखते हैं. दिक्कत यह है कि ये सब इतने आम हैं कि लोग इन्हें काम के दबाव या मौसम मान लेते हैं.

क्या बिना किसी लक्षण के भी डायबिटीज़ हो सकती है?+

हां, और यही टाइप 2 डायबिटीज़ की सबसे बड़ी दिक्कत है. बहुत से लोगों में शुरुआती सालों में कोई साफ लक्षण नहीं दिखता, ब्लड शुगर धीरे धीरे बढ़ता रहता है और शरीर इसे झेलता रहता है. जब तक थकान या प्यास जैसे लक्षण साफ दिखने लगते हैं, तब तक कई बार शुगर लंबे समय से ऊपर चल रही होती है, इसलिए जोखिम वाले लोगों को बिना लक्षण के भी जांच कराने की सलाह दी जाती है.

डायबिटीज़ होने का सबसे बड़ा कारण क्या है?+

कोई एक अकेला कारण नहीं होता, कई चीज़ें मिलकर असर डालती हैं. टाइप 2 डायबिटीज़ में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं, जिसे इंसुलिन रेज़िस्टेंस कहते हैं, और इसके पीछे ज़्यादा वज़न, कम हलचल, नींद की कमी और पारिवारिक इतिहास सबका हाथ होता है. टाइप 1 डायबिटीज़ अलग है, उसमें शरीर का अपना इम्यून सिस्टम इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं पर असर डालता है, और उसका सीधा संबंध खानपान या वज़न से नहीं है.

प्रीडायबिटीज़ और डायबिटीज़ में क्या फर्क है?+

प्रीडायबिटीज़ वह स्थिति है जहां ब्लड शुगर सामान्य से ज़्यादा है, पर इतना ज़्यादा नहीं कि उसे डायबिटीज़ कहा जाए. यह एक चेतावनी की स्थिति है, बीमारी का पक्का ऐलान नहीं. इस स्टेज पर खानपान, हलचल और वज़न में बदलाव लाकर शुगर को वापस सामान्य दायरे के करीब लाने की गुंजाइश काफी ज़्यादा होती है, बशर्ते इसे गंभीरता से लिया जाए और डॉक्टर की सलाह से आगे बढ़ा जाए.

किन लोगों को डायबिटीज़ की जांच जल्दी करानी चाहिए?+

जिनके परिवार में मां, पिता या भाई बहन को डायबिटीज़ रही हो, जिनका वज़न ज़्यादा है, जो ज़्यादातर समय बैठकर काम करते हैं, जिन महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान शुगर बढ़ी थी, या जिन्हें पहले से हाई ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल की दिक्कत है, उनमें खतरा बाकी लोगों से ज़्यादा माना जाता है. इन ग्रुप्स के लिए बिना लक्षण के भी साल में एक बार जांच कराना समझदारी है.

क्या शुरुआती लक्षण दिखने पर डायबिटीज़ को उलटा जा सकता है?+

यह इस बात पर निर्भर करता है कि स्थिति कितनी आगे बढ़ चुकी है. प्रीडायबिटीज़ और शुरुआती टाइप 2 डायबिटीज़ में कई लोगों को वज़न कम करने, खानपान सुधारने और नियमित हलचल से शुगर सामान्य दायरे के करीब लाने में मदद मिलती है, हालांकि यह नतीजा हर किसी के लिए एक जैसा नहीं होता. जो भी बदलाव करें, वह डॉक्टर की देखरेख में हो.

आगे पढ़ें

← सभी articles देखें