डायबिटीज़ के शुरुआती लक्षण और कारण, कैसे पहचानें और कब जांच कराएं
छोटा जवाब
अगर आपको बार बार प्यास लगती है, उसी वजह से बार बार पेशाब जाना पड़ता है, नींद पूरी करने के बाद भी थकान बनी रहती है, या वज़न बिना कोशिश के घट रहा है, तो ये डायबिटीज़ के कुछ सबसे आम शुरुआती लक्षण हो सकते हैं. लेकिन बहुत से लोगों में शुरुआत में कोई साफ लक्षण दिखता ही नहीं, इसलिए उम्र, वज़न और पारिवारिक इतिहास के हिसाब से समय समय पर जांच कराना सबसे भरोसेमंद रास्ता है.
डायबिटीज़ असल में होता क्या है
शरीर जो कुछ खाता है, उसे पचाकर ग्लूकोज़ यानी शक्कर में बदल देता है, जो खून के ज़रिए हर कोशिका तक पहुंचकर ऊर्जा बनती है. यह काम एक हार्मोन करता है, जिसे इंसुलिन कहते हैं.
डायबिटीज़ में यही तालमेल गड़बड़ा जाता है. या तो शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता, या कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति पहले जैसी संवेदनशील नहीं रहतीं. नतीजा एक जैसा होता है, खून में शक्कर ज़रूरत से ज़्यादा बनी रहने लगती है. यह अक्सर सालों में बनने वाली धीमी प्रक्रिया है, इसीलिए शुरुआती लक्षण इतने हल्के और नज़रअंदाज़ होने वाले लगते हैं.
शुरुआती लक्षण जो अक्सर पकड़ में नहीं आते
डायबिटीज़ के लक्षण किसी झटके की तरह नहीं आते, बल्कि धीरे धीरे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में घुल जाते हैं.
बार बार प्यास लगना और मुंह सूखना. खून में शक्कर ज़्यादा होने पर शरीर गुर्दों के ज़रिए उसे बाहर निकालता है, और साथ में ज़्यादा पानी भी निकलता है, इसलिए बार बार प्यास लगती है.
बार बार पेशाब जाना, खासकर रात में. ज़्यादा पानी पीने का सीधा नतीजा ज़्यादा पेशाब है. अगर रात में दो तीन बार उठना पड़ रहा है और पहले नहीं होता था, तो इसे हल्के में न लें.
नींद पूरी होने के बाद भी थकान. कोशिकाओं को ग्लूकोज़ सही तरीके से नहीं मिलता, इसलिए थकान आराम के बाद भी पूरी तरह नहीं जाती.
बिना कोशिश के वज़न घटना. जब कोशिकाओं को ग्लूकोज़ से ऊर्जा नहीं मिलती, तो शरीर मांसपेशियों और चर्बी को तोड़कर ऊर्जा बनाने लगता है. यह टाइप 1 में ज़्यादा साफ दिखता है, टाइप 2 में भी कुछ लोगों में हो सकता है.
धुंधला दिखना. ज़्यादा शक्कर आंखों के लेंस के आस पास पानी की मात्रा को प्रभावित कर सकती है, जिससे कुछ समय के लिए नज़र धुंधली लगती है और शुगर सामान्य होने पर सुधर जाती है.
घाव या कट का देर से भरना, और बार बार इन्फेक्शन. ज़्यादा शक्कर खून का बहाव और मरम्मत की क्षमता धीमी कर देती है. मसूड़ों में सूजन, त्वचा में खुजली और यूरिन इन्फेक्शन का बार बार लौटना भी इसी का हिस्सा हो सकते हैं.
हाथ पैरों में झनझनाहट या सुन्नपन. शुगर लंबे समय से ज़्यादा चलने पर नसों पर असर पड़ता है, जिससे उंगलियों में हल्की झनझनाहट महसूस हो सकती है.
यह सूची जांच की जगह नहीं ले सकती. इनमें से लगभग हर लक्षण थायराइड, खून की कमी, नींद की कमी या तनाव में भी दिख सकता है, इसलिए पक्का पता सिर्फ ब्लड टेस्ट से चलता है.
टाइप 1 और टाइप 2 के लक्षणों में फर्क
टाइप 1 डायबिटीज़ में लक्षण अक्सर तेज़ी से, कुछ हफ्तों के अंदर सामने आते हैं, और यह ज़्यादातर बच्चों या युवाओं में देखी जाती है, हालांकि किसी भी उम्र में हो सकती है. इसमें इम्यून सिस्टम इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है, इसलिए शरीर इंसुलिन बनाना लगभग बंद कर देता है. तेज़ी से वज़न घटना, बहुत ज़्यादा प्यास और थकान इसमें आमतौर पर साफ और जल्दी दिखते हैं.
टाइप 2 डायबिटीज़ धीरे धीरे, कई सालों में बनती है, और ज़्यादातर वयस्कों में देखी जाती है, हालांकि अब कम उम्र में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं. इसमें शरीर इंसुलिन बनाता है, पर कोशिकाएं उसके प्रति पहले जैसी संवेदनशील नहीं रहतीं. यही वजह है कि इसमें लक्षण महीनों या सालों तक बिना पहचाने रह सकते हैं, और कई बार पहला संकेत किसी और वजह से कराई गई जांच में मिलता है.
डायबिटीज़ होने के मुख्य कारण
डायबिटीज़ किसी एक कारण से नहीं होती, कई चीज़ें मिलकर इसका रास्ता बनाती हैं.
इंसुलिन रेज़िस्टेंस. टाइप 2 की जड़ में अक्सर यही होता है. समय के साथ कोशिकाएं इंसुलिन के संकेत को पहले जैसी अच्छी तरह नहीं समझतीं, जिससे शक्कर काबू में रखने के लिए शरीर को ज़्यादा इंसुलिन बनानी पड़ती है, और आखिरकार यह तालमेल टूटने लगता है.
ज़्यादा वज़न, खासकर पेट की चर्बी. पेट के आस पास की चर्बी सिर्फ दिखने में फर्क नहीं डालती, यह ऐसे रसायन छोड़ती है जो इंसुलिन के काम करने के तरीके को प्रभावित करते हैं. इसलिए पेट की चर्बी कम करना डायबिटीज़ का खतरा घटाने में भी मदद करता है.
कम हलचल वाली दिनचर्या. ज़्यादातर समय बैठकर बिताने वाले लोगों की मांसपेशियां ग्लूकोज़ का इस्तेमाल उतनी सक्रियता से नहीं करतीं. नियमित हलचल कोशिकाओं को इंसुलिन के प्रति फिर से संवेदनशील बनाने में मदद करती है.
पारिवारिक इतिहास और जीन. परिवार में मां, पिता या भाई बहन को डायबिटीज़ रही हो तो खतरा अपने आप बढ़ जाता है. जीन अकेले बीमारी तय नहीं करते, पर वे तय करते हैं कि आपका शरीर लाइफस्टाइल के असर के प्रति कितना संवेदनशील है.
नींद की कमी और लगातार तनाव. खराब नींद और लंबे समय का तनाव ऐसे हार्मोन बढ़ाते हैं जो ब्लड शुगर और इंसुलिन का तालमेल बिगाड़ सकते हैं, बाकी कारणों के साथ मिलकर असर को और बढ़ा देते हैं.
उम्र. पैंतालीस साल के बाद खतरा स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगता है, क्योंकि इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता धीरे धीरे कम होती जाती है, इसलिए इस उम्र के बाद जांच की ज़रूरत भी बढ़ जाती है.
टाइप 1 की कहानी अलग है, उसमें लाइफस्टाइल की भूमिका सीमित है और इसका संबंध शरीर के अपने इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया से होता है.
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