हाई ब्लड प्रेशर को नेचुरल तरीकों से कैसे कंट्रोल करें: लक्षण, कारण और घर पर सुधार का पूरा तरीका
छोटा जवाब
हाई ब्लड प्रेशर, यानी हाइपरटेंशन, आज भारत के शहरों और कस्बों दोनों में इतना आम हो चुका है कि बहुत से लोग इसे उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मान लेते हैं। सच यह है कि यह उन कुछ स्थितियों में से एक है जिसमें रोज़ की आदतें बदलकर बड़ा फर्क डाला जा सकता है, चाहे आप पहले से दवा ले रहे हों या नहीं।
सबसे बड़ा असर चार बदलावों से आता है: नमक रोज़ पांच ग्राम से कम रखना, हफ्ते में पांच दिन तेज़ चलना, शरीर का ज़्यादा वजन धीरे धीरे कम करना, और नींद तथा तनाव को संभालने का कोई तरीका अपनाना। इनमें से कोई भी एक अकेला जादुई नहीं है, लेकिन चारों मिलकर बीपी को काफी हद तक नीचे ला सकते हैं।
ज़रूरी सूचना: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है और चिकित्सकीय सलाह की जगह नहीं ले सकता। अगर आपको पहले से हाई बीपी की दवा चल रही है, या सीने में दर्द, सांस फूलना या बहुत तेज़ सिरदर्द जैसे लक्षण हैं, तो कृपया योग्य डॉक्टर से सलाह लें।
हाई ब्लड प्रेशर असल में है क्या
ब्लड प्रेशर उस दबाव को कहते हैं जिससे खून धमनियों की दीवारों पर ज़ोर डालता हुआ शरीर में बहता है। ऊपर वाली संख्या सिस्टोलिक, दिल के धड़कने के समय का दबाव बताती है, और नीचे वाली डायस्टोलिक, धड़कनों के बीच के आराम के समय का। आमतौर पर 120 से कम और 80 से कम सामान्य माना जाता है, जबकि 140 और 90 के आसपास या ऊपर लगातार बना रहना हाई बीपी की तरफ इशारा करता है।
यह दबाव धीरे धीरे बढ़ता है, अक्सर सालों तक, और शरीर इसका आदी हो जाता है। इसलिए ज़्यादातर लोगों को तकलीफ महसूस नहीं होती जबकि अंदर दिल, गुर्दे, आंखों की नसें और दिमाग की रक्त वाहिकाएं धीरे धीरे प्रभावित होती रहती हैं। यही वजह है कि इसे साइलेंट किलर कहा जाता है, यह चुपचाप नुकसान करता है और अक्सर तब पकड़ में आता है जब कोई बड़ी घटना हो चुकी होती है।
शुरुआती लक्षण जो लोग नज़रअंदाज़ कर देते हैं
सुबह उठते ही सिर के पिछले हिस्से में भारीपन, तेज़ दर्द नहीं, जो अक्सर चाय के बाद अपने आप कम हो जाता है।
गर्दन में जकड़न, खासकर जब नींद कम हुई हो या तनाव ज़्यादा रहा हो।
अचानक चक्कर जैसा महसूस होना, खासकर बैठे से उठते समय, हालांकि इसकी और वजहें भी हो सकती हैं।
कानों में हल्की सनसनाहट, और बिना मेहनत के थकान या सांस का जल्दी फूलना।
यह सूची जांच की जगह नहीं ले सकती। इनमें से हर लक्षण नींद की कमी, तनाव या थायराइड की गड़बड़ी में भी दिख सकता है। सबसे भरोसेमंद तरीका यह है कि लक्षण के इंतज़ार में न रहें, बल्कि समय समय पर बीपी नापें, खासकर अगर परिवार में किसी को हाई बीपी, दिल की बीमारी या डायबिटीज़ रही हो।
हाई बीपी की सबसे आम वजहें, भारतीय जीवनशैली के हिसाब से
ज़्यादा नमक वाला खाना। भारतीय थाली में नमक सिर्फ ऊपर से नहीं डाला जाता, यह अचार, पापड़, नमकीन, चिप्स और बाहर के खाने में पहले से भरा होता है। शरीर इस नमक को संभालने के लिए ज़्यादा पानी रोकता है, जिससे रक्त वाहिकाओं पर दबाव बढ़ता है।
पेट के आसपास बढ़ती चर्बी। ज़्यादा वजन दिल को ज़्यादा मेहनत करने पर मजबूर करता है और बीपी नियंत्रित करने वाले हार्मोन को भी बिगाड़ता है।
बहुत कम शारीरिक गतिविधि और नींद की कमी। दिन भर बैठे रहना रक्त वाहिकाओं को उतना लचीला नहीं रहने देता, और छह घंटे से कम नींद तनाव हार्मोन को ऊंचा बनाए रखती है। इस पर गहराई से समझने के लिए रात को नींद नहीं आती तो क्या करें पढ़ना उपयोगी रहेगा।
लगातार तनाव, शराब और तंबाकू। ये अकेले बीमारी नहीं बनाते, लेकिन नींद बिगाड़ते हैं और रक्त वाहिकाओं की दीवारों को सीधे प्रभावित करते हैं।
लिवर और गुर्दों की सेहत। शरीर में तरल पदार्थ और नमक का संतुलन बड़े हिस्से में गुर्दों के ज़रिए बनता है, और लिवर की सेहत भी इसे प्रभावित करती है। पेट की चर्बी और थकान साथ हो तो फैटी लिवर के लक्षण और डाइट पढ़ना मददगार रहेगा।
नमक और खाने में क्या बदलाव करें
छिपे हुए नमक को पहचानिए। पापड़, अचार, नमकीन, चिप्स और डिब्बाबंद खाना, इनमें नमक साफ स्वाद में नहीं दिखता लेकिन मात्रा बहुत ज़्यादा होती है। हफ्ते में एक दो बार ठीक है, रोज़ की आदत खतरनाक है।
पोटैशियम वाली सब्ज़ियां और फल बढ़ाइए। केला, पालक, टमाटर, नारियल पानी और दाल शरीर से अतिरिक्त सोडियम निकालने में मदद करते हैं। सिर्फ नमक घटाना काफी नहीं, दोनों साथ चलने चाहिए।
साबुत अनाज और अच्छी चर्बी सीमित मात्रा में। ब्राउन राइस, ज्वार, बाजरा, ओट्स, और सरसों या जैतून का तेल मुट्ठी भर से ज़्यादा नहीं।
चीनी और मीठे पेय घटाइए। कोल्ड ड्रिंक और मिठाई सीधे वजन बढ़ाते हैं, और वजन बढ़ने का सीधा रिश्ता बीपी बढ़ने से है।
रोज़ की एक्सरसाइज़ और वजन का रोल
एक्सरसाइज़ बीपी पर दवा जितना असरदार असर दिखा सकती है, अगर लगातार की जाए। यहां लक्ष्य किसी भारी रूटीन का नहीं, नियमितता का है।
रोज़ तेज़ चलना। हफ्ते में कम से कम पांच दिन, तीस से चालीस मिनट। यह अकेला बदलाव कुछ हफ्तों में साफ फर्क ला सकता है।
हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग जोड़िए। हफ्ते में दो तीन दिन, हल्के वज़न या शरीर के वज़न से की जाने वाली एक्सरसाइज़, जिससे मेटाबॉलिज्म बेहतर काम करता है।
वजन धीरे धीरे घटाइए। पांच से दस प्रतिशत वजन कम होने पर बीपी में साफ सुधार दिखता है। बहुत तेज़ वजन घटाना उल्टा असर कर सकता है, हफ्ते में आधा किलो के आसपास की रफ्तार सुरक्षित है।
योग और सांस की एक्सरसाइज़। धीमी गिनती के साथ गहरी सांस लेना तंत्रिका तंत्र को शांत करता है और बीपी में सुधार दिखा सकता है।
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