एडिक्शन काउंसलिंग क्या होती है और इसे शुरू करने का सही तरीका
छोटा जवाब
एडिक्शन काउंसलिंग बातचीत और नियमित सेशन के ज़रिए यह समझने और बदलने की प्रक्रिया है कि किसी व्यक्ति की नशे की आदत कहां से शुरू हुई, कौन से हालात उसे बढ़ाते हैं, और रोज़ की ज़िंदगी में उसे कैसे कम किया जा सकता है। इसमें भर्ती होने की ज़रूरत नहीं पड़ती, व्यक्ति अपने घर और काम में रहते हुए हफ्ते में एक या दो बार काउंसलर से मिलता है।
यह नशा मुक्ति केंद्र से अलग है, जहां व्यक्ति कुछ हफ्तों के लिए भर्ती होता है और डॉक्टर की निगरानी में शरीर से नशे का असर उतारा जाता है। हल्के से मध्यम मामलों में, जहां withdrawal का मेडिकल जोखिम नहीं है, काउंसलिंग अक्सर पहला और काफी कदम होती है। शुरू करने के लिए सबसे पहला काम है एक रजिस्टर्ड काउंसलर या मनोचिकित्सक से एक बार मिलना, चाहे वह ऑनलाइन हो या आमने-सामने, ताकि स्थिति का सही अंदाज़ा मिल सके।
एडिक्शन काउंसलिंग असल में काम कैसे करती है
बहुत से लोग सोचते हैं कि काउंसलिंग का मतलब है किसी को समझाना कि नशा बुरा है और उसे छोड़ देना चाहिए। असल में काम इससे बहुत अलग और धीमा होता है।
शुरुआती सेशन ज़्यादातर सिर्फ सुनने में जाते हैं। काउंसलर यह समझने की कोशिश करते हैं कि नशा कब शुरू हुआ, किस समय और किन हालात में मात्रा बढ़ती है, और इसके पीछे तनाव, अकेलापन, काम का दबाव, रिश्तों की दिक्कत या कोई पुरानी घटना तो नहीं। इस समझ के बिना कोई भी सलाह ऊपर-ऊपर की रह जाती है।
इसके बाद काम दो हिस्सों में बंटता है। पहला हिस्सा है ट्रिगर पहचानना, यानी वे जगह, लोग, समय या भावनाएं जिनके बाद नशे की तलब सबसे ज़्यादा बढ़ती है। दूसरा हिस्सा है उस तलब के समय कुछ और करने का तरीका सीखना, छोटे व्यावहारिक कदम जो असली ज़िंदगी में काम कर सकें, न कि सिर्फ किताबी सलाह।
काउंसलिंग में कोई एक तय तरीका सबके लिए काम नहीं करता। कुछ लोगों के लिए अकेले बैठकर बात करना असरदार रहता है, कुछ के लिए परिवार के साथ सेशन ज़्यादा काम करते हैं, और कुछ मामलों में सपोर्ट ग्रुप का माहौल, जहां वही अनुभव से गुज़रे और लोग मौजूद हों, सबसे ज़्यादा मदद करता है।
कब सिर्फ काउंसलिंग काफी है, और कब सेंटर की ज़रूरत पड़ती है
यह वह सवाल है जो हर परिवार के मन में सबसे पहले आता है, और जवाब केस के हिसाब से बदलता है।
काउंसलिंग से शुरुआत करना ठीक रहता है अगर: व्यक्ति हल्के से मध्यम मात्रा में नशा लेता है, withdrawal के लक्षण हल्के रहते हैं जैसे बेचैनी या नींद में दिक्कत, काम और घर की ज़िंदगी पूरी तरह रुकी नहीं है, और व्यक्ति खुद बात करने के लिए तैयार है। ऐसे मामलों में नियमित काउंसलिंग, परिवार का सहयोग और एक साफ योजना अक्सर काफी होती है।
सेंटर में भर्ती की ज़रूरत तब बढ़ती है जब: पहले कभी नशा छोड़ने पर दौरे, बेहोशी या गंभीर लक्षण आ चुके हों, मात्रा सालों से बहुत ज़्यादा रही हो, घर पर कई बार कोशिश के बाद भी छूट नहीं रहा हो, या साथ में डिप्रेशन जैसी कोई और मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति भी मौजूद हो। ऐसे मामलों में अकेली काउंसलिंग काफी नहीं रहती, मेडिकल निगरानी ज़रूरी हो जाती है।
इन दो रास्तों को एक सीधी रेखा की तरह देखना ज़्यादा मदद करता है। कई मामलों में काउंसलिंग से शुरुआत होती है, और अगर हालात बिगड़ें, तो वही काउंसलर डॉक्टर या केंद्र के पास भेज देता है। यह फैसला अकेले अंदाज़े से लेने के बजाय किसी जानकार के साथ लेना सुरक्षित रहता है।
किस रास्ते से शुरुआत करें, यह समझना ही सबसे बड़ा पहला कदम है। SuperLiving पर 20+ कोच में से एक काउंसलिंग और डी-एडिक्शन सपोर्ट के लिए है, जो बिना जजमेंट के यह समझने में मदद करता है कि अभी घर पर रहते हुए काउंसलिंग से शुरुआत ठीक रहेगी या किसी काउंसलर से मिलने का सही समय आ गया है। SuperLiving डाउनलोड करें
काउंसलिंग शुरू करने के व्यावहारिक कदम
जानकारी होना एक बात है, पहला कदम उठाना दूसरी। यहां वह क्रम है जो ज़्यादातर मामलों में काम करता है।
पहला कदम, एक शुरुआती बातचीत तय करें। यह किसी मनोचिकित्सक, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट या रजिस्टर्ड डी-एडिक्शन काउंसलर के साथ हो सकती है। कई शहरों के सरकारी अस्पतालों की मनोरोग ओपीडी में यह सुविधा मुफ्त या बहुत कम खर्च में मिलती है, और कई प्राइवेट क्लिनिक व निजी काउंसलर भी यह सेवा देते हैं।
दूसरा कदम, यात्रा और असहजता को बाधा मत बनने दें। अगर आमने-सामने बैठना मुश्किल लगता है या शुरुआत में शर्म महसूस होती है, तो ऑनलाइन या फोन पर सेशन भी एक सही और मान्य तरीका है। कई लोगों के लिए पहला सेशन फोन पर करना ही असली शुरुआत को आसान बनाता है।
तीसरा कदम, शुरुआती तीन से चार सेशन को सिर्फ समझने का समय मानें। इस दौरान कोई बड़ा फैसला या सख्त नियम लागू करने की कोशिश मत करें। मकसद सिर्फ यह है कि काउंसलर और व्यक्ति दोनों को स्थिति की साफ तस्वीर मिले।
चौथा कदम, एक छोटा और मापने लायक लक्ष्य तय करें। जैसे अगले दो हफ्ते किसी एक तय ट्रिगर की स्थिति में अलग तरीके से प्रतिक्रिया देने की कोशिश, न कि पूरी ज़िंदगी एक साथ बदल देने का दबाव।
पांचवां कदम, नियमितता बनाए रखें। हफ्ते में एक सेशन छूटना आम बात है, लेकिन लगातार कई हफ्ते छोड़ देना काउंसलिंग के असर को काफी कम कर देता है। जैसे किसी भी आदत के लिए, यहां भी नियमितता जानकारी से ज़्यादा मायने रखती है।
काउंसलर चुनते समय क्या देखें
हर कोई जो खुद को "काउंसलर" कहता है, ज़रूरी नहीं कि इस काम के लिए ट्रेंड हो। चुनते समय कुछ बातें ज़रूर जांचें।
सबसे पहले देखें कि व्यक्ति के पास मनोविज्ञान, मनोचिकित्सा या काउंसलिंग में मान्य डिग्री या प्रशिक्षण है या नहीं। यह पूछने में कोई शर्म नहीं है कि उनका अनुभव किस तरह के मामलों में रहा है। दूसरा, पहली मुलाकात में यह महसूस करें कि क्या बिना जज किए सुना जा रहा है, या बार बार सिर्फ यह कहा जा रहा है कि नशा गलत है। अच्छी काउंसलिंग समझने से शुरू होती है, लेक्चर देने से नहीं।
तीसरा, फीस और सेशन की संख्या पहले से साफ कर लें, ताकि बीच में भ्रम न हो। चौथा, अगर कुछ सेशन के बाद भी सहज महसूस न हो, तो दूसरा काउंसलर आज़माना ठीक है, यह सही फिट ढूंढना है।